2 महीने से चल रहा आंदोलन, PoJK में मस्जिदों से इमाम कीअपील-पाकिस्तानी सेना के खिलाफ सड़कों पर उतरो

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Pakistani Army in PoK: साल 1990 के दशक में कश्मीर में मस्जिद की लाउडस्पीकर से जो आवाजें गूंजती थीं, वो एक बार फिर से सुनाई दे रही हैं. लेकिन इस बार श्रीनगर नहीं मुजफ्फराबाद में. दरअसल, इतिहास में पहली बार पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में लोकल मस्जिदों के इमामों ने लोगों से सड़कों पर उतरने और पाकिस्तानी फोर्स की बेरहम फायरिंग के खिलाफ आवाज उठाने की अपील की है.

बता दें कि 1990 के दशक में इन्हीं मस्जिदों का इस्तेमाल बॉर्डर के भारतीय हिस्से में रहने वाले लोगों को लुभाने के लिए किया जाता था. पाकिस्तान आर्मी के कहने पर, LoC के उस पार से पाकिस्तान में सुनहरे भविष्य का वादा करते हुए घोषणाएं की जाती थीं. ऐसे में जानकारों का कहना है कि अब कर्मो का फल मिल रहा है.

निहत्थे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बेरहमी से कार्रवाई

दरअसल, जिस इलाके का इस्तेमाल पाकिस्तान की आर्मी और उसकी जासूसी एजेंसी ISI कभी आतंक और अशांति फैलाने के लिए करती थी, अब वहां खुद विद्रोह हो रहा है. बेगुनाह और निहत्थे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बेरहमी से कार्रवाई की गई पिछले 5 दिनों में PoJK में 50 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और लगभग 50 लोग घायल हुए हैं. शुक्रवार को पाकिस्तानी फोर्स ने उन निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोलियां चलाईं जो खाना, बिजली और बुनियादी अधिकारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे.

इतना ही नहीं, विरोध की आवाज़ को दबाने के लिए गोलियों का इस्तेमाल किया गया, जिसमें छह आम नागरिक मारे गए, जिसमें एक रावलकोट का और 5 मुजफ्फराबाद के नागरिक थे. वहीं, अस्पतालों में घायलों के इलाज के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी है, और कई इलाकों में इंटरनेट और मोबाइल सर्विस बंद हैं. फिर भी, भीड़ बढ़ती जा रही है.

PoJK में सड़कों पर क्यों उतरे लोग

बता दें कि ये विरोध प्रदर्शन महंगाई, बिजली कटौती, आटे की कमी और दशकों से चले आ रहे मिलिट्री के दमन, उत्पीड़न, भेदभाव और ज़्यादती के वजह से शुरू हुए. लेकिन अब इसका कारण पिछले महीने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पाक आर्मी और पुलिस द्वारा आम नागरिकों की हत्या थी. वर्षो से, POJK के लोग इन चीज़ों की शिकायत करते आ रहे हैं-

  • पाकिस्तान आर्मी और रेंजर्स की ज्यादतियां
  • एक्टिविस्ट्स का ज़बरदस्ती गायब किया जाना और उन्हें टॉर्चर करना
  • बिना किसी डेवलपमेंट के रिसोर्स की लूट-पाट
  • “आज़ाद कश्मीर” का टैग होने के बावजूद कोई पॉलिटिकल अधिकार न मिलना

अब वही गुस्सा फूट पड़ा है. आज़ादी के नारे गूंज रहे हैं. मुजफ्फराबाद, रावलकोट, बाग़ और मीरपुर के वीडियो में हज़ारों लोगों को “हम क्या चाहते – आज़ादी” के नारे लगाते और काले झंडे लहराते देखा जा सकता है. बता दें कि पहली बार, मस्जिदों के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल भी हो रहा है. जिन पर लंबे समय से सरकार का कंट्रोल था. मस्जिद से पाकिस्तानी सरकार के समर्थन में नहीं, बल्कि उसके ख़िलाफ़ लोगों को इकट्ठा होने के लिए कहा जा रहा है.

वहीं, मुजफ्फराबाद के एक वायरल क्लिप में एक प्रदर्शनकारी को चिल्लाते हुए सुना गया: “हम पाकिस्तानी नहीं हैं. हम कश्मीरी हैं. हमारी जमीन छोड़ दो.”

घबराया हुआ है इस्लामाबाद

इसी बीच सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस्लामाबाद घबरा गया है. POJK के हाथ से निकलने के साथ, पाकिस्तान अब कश्मीर घाटी में आतंक फैलाकर ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है – जैसा कि कुलगाम और अनंतनाग में हाल ही में हुई टारगेटेड किलिंग्स में देखा गया. लेकिन POJK के अंदर, नुकसान हो चुका है. नैरेटिव बदल गया है. सस्ते आटे की मांग से लेकर पाकिस्तान के कब्ज़े को खुलेआम नकारने तक, इस आंदोलन ने एक ऐसा पॉलिटिकल रूप ले लिया है जिससे रावलपिंडी को सबसे ज़्यादा डर लगता है.

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