समुद्र में रंगों का रहस्यमयी खेल, जानिए जलवायु के लिए क्यों अहम है ‘फाइटोप्लांकटन’

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

पृथ्वी का हर कोना अपने अंदर अनगिनत रहस्य छुपाए बैठा है, लेकिन कभी-कभी प्रकृति ऐसा नजारा दिखा देती है जो सीधे आंखों के साथ दिमाग को भी चौंका देता है. जून 2025 में कुछ ऐसा ही हुआ, जब स्कॉटलैंड के शेटलैंड द्वीपों के पास उत्तरी सागर का रंग अचानक बदल गया. शांत दिखने वाला समुद्र देखते ही देखते हरे, नीले और दूधिया रंगों में बदल गया. यह बदलाव इतना विशाल था कि इसे अंतरिक्ष से भी साफ देखा जा सकता था. यह कोई सामान्य प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि सूक्ष्म जीवों के विस्फोटक फैलाव यानी फाइटोप्लांकटन ब्लूम का नतीजा था.

अंतरिक्ष से दिखा 160 किलोमीटर तक फैला रंगीन समुद्र

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA के Landsat 9 ने 13 जून 2025 को इस अद्भुत दृश्य को कैद किया. उपग्रह के OLI-2 कैमरे से ली गई तस्वीरों में यह रंगीन ब्लूम करीब 160 किलोमीटर तक फैला हुआ दिखाई दिया. कहीं समुद्र गहरे हरे रंग में नजर आया, तो कहीं फिरोजी नीला और कुछ हिस्सों में दूधिया सफेद. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह रंगों का फैलाव अलग-अलग प्रकार के सूक्ष्म जीवों की मौजूदगी का संकेत था, जो एक साथ तेजी से बढ़ रहे थे.

रंगों के पीछे का विज्ञान, सूक्ष्म जीवों का कमाल

इस अद्भुत नजारे के पीछे फाइटोप्लांकटन नाम के बेहद छोटे जीव जिम्मेदार होते हैं, जो आंखों से दिखाई नहीं देते. डायटम नामक प्रजाति में क्लोरोफिल की मात्रा अधिक होती है, जिससे पानी हरा दिखाई देता है. वहीं कोकोलिथोफोर नामक जीवों के शरीर पर कैल्शियम कार्बोनेट की चमकदार परत होती है, जो पानी को दूधिया या फिरोजी नीला रंग देती है. जब ये दोनों और अन्य सूक्ष्म जीव एक साथ बड़ी संख्या में मौजूद होते हैं, तो समुद्र में रंगों का ऐसा मिश्रण बनता है जो किसी प्राकृतिक पेंटिंग जैसा नजर आता है.

आखिर क्यों होता है ब्लूम, अचानक कैसे बढ़ती है संख्या

फाइटोप्लांकटन की यह तेज वृद्धि किसी एक वजह से नहीं होती, बल्कि कई प्राकृतिक परिस्थितियों के मेल से होती है. जब समुद्र की सतह पर भरपूर सूर्य का प्रकाश मिलता है, पानी में कार्बन डाइऑक्साइड पर्याप्त होती है और साथ ही नाइट्रेट, फॉस्फेट और सिलिकेट जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं, तब इन जीवों के लिए आदर्श माहौल बन जाता है. ऐसे में ये तेजी से बढ़ते हैं और कुछ ही दिनों में इनकी संख्या लाखों-करोड़ों तक पहुंच जाती है. इसी विस्फोटक वृद्धि को वैज्ञानिक भाषा में ब्लूम कहा जाता है, जो सैकड़ों किलोमीटर तक फैल सकता है और कई हफ्तों तक बना रह सकता है.

समुद्री जीवन की नींव, हर जीव इन पर निर्भर

फाइटोप्लांकटन समुद्री जीवन की बुनियाद माने जाते हैं. ये प्राथमिक उत्पादक होते हैं, जो सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा बनाते हैं और पूरे समुद्री खाद्य तंत्र की शुरुआत करते हैं. छोटे जूप्लैंकटन इन्हें खाते हैं, फिर छोटी मछलियां उन जूप्लैंकटन को खाती हैं और अंत में बड़ी मछलियां और व्हेल जैसे जीव इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हैं. अगर ये सूक्ष्म जीव न हों, तो समुद्र में जीवन का पूरा संतुलन बिगड़ सकता है.

जलवायु पर असर, धरती के संतुलन में बड़ी भूमिका

इनका महत्व सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं है. फाइटोप्लांकटन बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को सोखते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जिससे पृथ्वी का वायुमंडल संतुलित रहता है. जब ये मरते हैं, तो समुद्र की गहराई में जाकर कार्बन को लंबे समय तक जमा कर देते हैं. यह प्रक्रिया जलवायु परिवर्तन को धीमा करने में मदद करती है और ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने में अहम भूमिका निभाती है.

खूबसूरती के पीछे खतरा

हालांकि यह दृश्य जितना सुंदर दिखता है, उतना ही खतरनाक भी हो सकता है. कुछ फाइटोप्लांकटन प्रजातियां जहरीले पदार्थ बनाती हैं, जिन्हें रेड टाइड कहा जाता है, जो मछलियों और इंसानों के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. इसके अलावा, जब बड़ी मात्रा में ये जीव मरते हैं और सड़ते हैं, तो पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. इससे ‘डेड जोन’ बन जाते हैं, जहां अन्य समुद्री जीवों का जीवित रहना मुश्किल हो जाता है.

छोटे जीव, बड़ा असर

समुद्र में दिखने वाला यह रंगों का अद्भुत खेल सिर्फ एक खूबसूरत दृश्य नहीं, बल्कि प्रकृति के जटिल और संतुलित तंत्र का हिस्सा है. फाइटोप्लांकटन भले ही सूक्ष्म हों, लेकिन उनका प्रभाव पूरी पृथ्वी पर पड़ता है. यह घटना हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के सबसे छोटे जीव भी हमारे ग्रह के भविष्य को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं.

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