New Delhi: नई दिल्ली में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर कश्मीर दौरे पर जा रहे हैं. वह इस दौरान जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुला से मिलेंगे. गुरुवार को वह लद्दाख का भी दौरा करेंगे. पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में मचे कोहराम के बीच अमेरिकी राजदूत का कश्मीर दौरा काफी मायने रखता है. यहां एक बात साफ समझना जरूरी है. अभी ऐसा कोई संकेत नहीं है कि सर्जियो गोर कश्मीर किसी नई अमेरिकी कश्मीर नीति या भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता के प्रस्ताव के साथ पहुंच रहे हैं.
सीधे पीओके के भारत में विलय से जोड़ना जल्दबाजी
इसलिए उनके दौरे को सीधे पीओके के भारत में विलय या भारत के कब्जे में आने से जोड़ना जल्दबाजी होगी. लेकिन दौरे की टाइमिंग जरूर महत्वपूर्ण है. एक तरफ जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार काम कर रही है. दूसरी तरफ पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आर्थिक और राजनीतिक असंतोष चरम पर है. ऐसे समय में अमेरिकी राजदूत का श्रीनगर जाना पाकिस्तान के लिए निश्चित तौर पर चिंता का विषय हो सकता है.
कई अमेरिकी राजदूतों ने किया कश्मीर का दौरा
सर्जियो गोर से पहले कई अमेरिकी राजदूतों ने कश्मीर का दौरा किया है. कश्मीर में आतंकवाद के पनपने के वक्त से ही ऐसा होता आ रहा है. 1990 के दशक में कश्मीर पर पूरी दुनिया की नजर थी. उस वक्त अमेरिका की नीति कश्मीर के मसले को सुलझाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की थी. लेकिन, भारत कभी भी इसके लिए तैयार नहीं हुआ. इसी क्रम में अमेरिकी राजदूत फ्रैंक विजनर ने 1995 में कश्मीर का दौरा किया.
अलगाववादियों और छात्रों-पत्रकारों तक से मुलाकात
इस दौरान उन्होंने वहां के राजनेताओं के साथ-साथ अलगाववादियों और छात्रों-पत्रकारों तक से मुलाकात की. इसका संकेत था कि अमेरिका कश्मीर मसले को सुलझाने को उत्सुक है. इसके बाद कई मौकों पर अमेरिका कश्मीर से जुड़े हर मौके पर भारत-पाकिस्तान के बीच परोक्ष तौर पर एक मध्यस्थ के रूप में खड़ा होते रहा. 1999 के कारगिल जंग में भी अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने नवाज शरीफ को वाशिंगटन तलब किया था.
अमेरिका की बदली हुई भूमिका का सबसे बड़ा उदाहरण
कारगिल युद्ध अमेरिका की बदली हुई भूमिका का सबसे बड़ा उदाहरण था. उस समय तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को वॉशिंगटन बुलाया था. दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के बाद अमेरिका ने साफ किया कि नियंत्रण रेखा का सम्मान किया जाना चाहिए और वहां से पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे हटना होगा. यह भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि अमेरिका ने उस समय भारत और पाकिस्तान को एक बराबर जिम्मेदार ठहराने की कोशिश नहीं की.
अमेरिका की सोच में बदलाव
पाकिस्तान की तरफ से नियंत्रण रेखा पार करने को लेकर वॉशिंगटन ने अपना रुख स्पष्ट किया. कारगिल के बाद कश्मीर को लेकर अमेरिका की सोच में एक और बदलाव आया. अब उसका जोर विवाद के राजनीतिक समाधान से ज्यादा इस बात पर था कि भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव न बढ़े.
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