US Project A119: क्या आपने कभी सोचा है कि यदि चांद पर परमाणु बम ब्लास्ट किया जाए तो क्या होगा. खासतौर पर जब वहां पृथ्वी की तरह वायुमंडल नहीं है. बता दें कि अमेरिकी एयरफोर्स ने 6 दशक से भी अधिक पहले ऐसी योजना बनाई थी. साल 1958 में US एयरफोर्स ने शोधकर्ताओं के एक छोटे से ग्रुप को लेकर एक सीक्रेट प्रोजेक्ट शुरू किया था, जिसका मकसद चांद पर परमाणु धमाका करना था.
अमेरिका ने बाहरी दुनिया के लिए इस प्रोजेक्ट को नाम- ‘A Study of Lunar Research Flights दिया गया था. जबकि इसका सीक्रेट नाम प्रोजेक्ट A119 था.
स्पुतनिक से हुई बेइज्जती को मिटाने की कोशिश
रिपोर्ट के अनुसार, वास्तव में यह सोवियत यूनियन द्वारा दुनिया में पहली सैटेलाइट स्पुतनिक लॉन्च के बाद अमेरिका को हुई बेइज्जती से ध्यान हटाना था. वहीं बाद में प्रोजेक्ट के लीडर लियोनार्ड राइफेल ने बताया कि US एयर फोर्स अमेरिका की क्षमता को दिखाना चाहती थी, जिसके तहत चंद्रमा पर धमाका करना था, ऐसा करने एक विशाल चमक पैदा होती और मलबे का एक फैलता हुआ बादल बन सकता था.
चंद्रमा पर कभी नहीं फोड़ा गया परमाणु बम
राइफेल ने आर्मर रिसर्च फाउंडेशन में इस काम का नेतृत्व किया. यह अब इलिनोइस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का हिस्सा है. बाद में राइफेल ने प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए कहा था कि यह विशेषज्ञ रिपोर्ट और व्यावहार्यता की गणना के स्तर तक तो आगे बढ़ा, लेकिन कभी ऑपरेशनल प्लानिंग के चरण तक नहीं पहुंचा. न तो कोई वॉरहेड ल़ॉन्च किया गया और न ही चंद्रमा पर कोई परमाणु उपकरण फोड़ा गया.
चंद्रमा पर मशरूम के बादल बनना संभव नहीं
बता दें कि अमेरिका का मकसद चंद्रमा पर मशरूम जैसे बादल बनाना नहीं था, क्योंकि यह वायुमंडल पर निर्भर करता है. चंद्रमा पर पृथ्वी की तरह वायुमंडल न के बराबर है. ऐसे में धमाके के बाद ऊपर उठने वाला जाना पहचान नजारा नहीं होने वाला था. राफेल ने साल 2000 में द ऑब्जर्वर से इस योजना पर बात की थी. उन्होंने कहा कि कॉन्स्पेट में धमाके को चंद्रमा के किनारे, रात वाले हिस्से में करने की योजना थी. उन्होंने इसके पीछे पीआर और दूसरों से आगे निकलने की होड़ को प्रमुख वजह बताया, जो ऐसे समय में हुई, जब अमेरिका अंतरिक्ष के क्षेत्र में सोवियत संघ से पीछे छूटता दिख रहा था.

