पहली भोजपुरी फिल्म ने पूर्वांचल के ग्रामीण परिवेश से कराया था रुबरु, स्क्रीनिंग से ही मच गया था तहलका

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First Bhojpuri Film: इस समय भोजपुरी का नाम सुनते ही लोगों के मन में न जाने कैसे-कैसे अश्लील गाने और कुछ अर्धनग्न अभिनेत्रियों की तस्वीर उभरकर सामने आ जाती है. ये स्थिति भोजपुरी भाषा और इंडस्ट्री दोनों को गर्त की तरफ ले जा रही है. इन सबके बीच क्या आपने एक ऐसी भोजपुरी फिल्म देखी है, जो अश्लीलता से कोशों दूर हो. फिल्म में ग्रामीण परिवेश के यथार्थ का चित्रण हो. 23 फरवरी 1963 में मात्र 5 लाख के बजट और विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी के निर्देशन में बनी पहली भोजपुरी फिल्म “गंगा मईया तोहें पियरी चढइबों.” विधवा पुर्नविवाह पर आधारित इस फिल्म ने उस समय में 80 लाख रुपये की कमाई की थी.

पूर्वांचल के ग्रामीण परिवेश से रुबरु कराती फिल्म
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण परिवेश को ध्यान में रखते हुए नज़ीर हसन ने बहुत ही बेहतरीन कहानी लिखी थी. एक ऐसी कहानी जो एक किसान को मजदूर में परिवर्तित होते दिखाती है. ये फिल्म दिखाती है कि कैसे नशा एक हंसते खेलते परिवार का सत्यानाश कर देता है. कैसे एक बाप की मजबूरी और मां-बाप का अपने बच्चों के प्रति स्वार्थ होता है. ये कहानी एक बेटी का कर्तव्य बोध भी कराती है. कहानी में बाप के लिए बेटी का त्याग दिखाया गया है.

ये एक ऐसी कहानी जो हमारे समाज के दोहरे चेहरों से आपको रुबरु करवाती है. दरअसल, हर गांव में एक चुगला भाई होता है, उसके वजह से कई घर फूट जाते हैं. ये ऐसे ही एक चुगले भाई की बलि चढ़ी एक लड़की की कहानी है.

उस स्तर तक की सोच शायद ही आज भोजपुरी इंडस्ट्री में किसी लेखक की होगी. आज भोजपुरी इंडस्ट्री के कुछ लेखक और गायक लाहंगा और चोली में ही उलझ कर रह गए हैं. दर्शक और श्रोता भी बड़े चाव से उनके फूहड़ गीतों को सुनते हैं.

फिल्म ने पहली स्क्रीनिंग में ही मचाया था तहलका
इस फिल्म ने पहली स्क्रीनिंग में ही तहलका मचा दिया था. इसकी पहली स्क्रीनिंग सदाकत आश्रम में की गई थी. कुमकुम, अशिम कुमार, लीला मिश्रा, नज़ीर हसन, रामायण तिवारी और भूषण तिवारी ने कहानी के पात्रों को अपनी कला से जीवंत कर दिया था. यदि आपको भी ये जानना है की असल में भोजपुरी इंडस्ट्री क्या सोच के बनाई गयी और क्या है तो ये फिल्म एक बार जरूर देखें.

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