केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) ने भारत एक्सप्रेस मेगा कॉन्क्लेव के मंच से अपनी कार्यशैली और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में लागत कम करने के अनुभव साझा करते हुए बताया कि सही फैसलों और तकनीक के इस्तेमाल से सरकारी खजाने के हजारों करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं. कार्यक्रम के दौरान भारत एक्सप्रेस के सीएमडी उपेंद्र राय (CMD Upendrra Rai) के साथ बातचीत में उन्होंने कई दिलचस्प और प्रेरक किस्से सुनाए.
धीरूभाई अंबानी से जुड़ा ऐतिहासिक किस्सा
गडकरी ने बताया कि उनका हमेशा से मानना रहा है कि यदि प्रोजेक्ट्स को पारदर्शिता, तकनीकी समझ और मजबूत निर्णय क्षमता के साथ लागू किया जाए तो लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है. इसी संदर्भ में उन्होंने मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के निर्माण से जुड़ा एक पुराना किस्सा साझा किया. उन्होंने कहा कि 1995-2000 के दौरान जब इस एक्सप्रेसवे का निर्माण प्रस्तावित था, तब रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) की ओर से लगभग 3600 करोड़ रुपये का सबसे कम टेंडर आया था. हालांकि गडकरी का मानना था कि यह सड़क करीब 1600 से 1800 करोड़ रुपये में बन सकती है.
उन्होंने बताया कि इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने वह टेंडर अस्वीकार कर दिया और सरकार के स्तर पर परियोजना को आगे बढ़ाया. परिणामस्वरूप सड़क का निर्माण काफी कम लागत में हुआ और करीब 2000 करोड़ रुपये की बचत संभव हो सकी. गडकरी ने कहा कि यह फैसला उस समय चुनौतीपूर्ण जरूर था, लेकिन सही योजना और प्रबंधन के कारण यह सफल साबित हुआ.
मैनेजमेंट की ट्यूशन
नितिन गडकरी ने आगे जोजिला टनल (Zoji La Tunnel) परियोजना का उदाहरण देते हुए बताया कि शुरुआत में इस टनल का अनुमानित खर्च लगभग 11,000 करोड़ रुपये था. बाद में टनल तकनीक को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाकर और स्टैंडर्ड्स में जरूरी बदलाव करके इसकी लागत घटाकर लगभग 5,400 करोड़ रुपये कर दी गई. इस तरह इस परियोजना में 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की बचत संभव हुई.
गडकरी ने बताया कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और लगभग 8 डिग्री तापमान में भी जोजिला टनल का काम लगभग 82 प्रतिशत तक पूरा हो चुका है. उनके अनुसार स्वदेशी तकनीक और बेहतर प्रबंधन से बड़े प्रोजेक्ट्स को भी कम लागत में पूरा किया जा सकता है. उनकी बातों से प्रभावित होकर उपेंद्र राय ने मजाकिया अंदाज में कहा कि उन्हें मैनेजमेंट सीखने के लिए गडकरी जी से ट्यूशन लेनी पड़ेगी.

