Masoud Pezeshkian: ईरान मुस्लिम देशों के साथ किसी भी तरह का युद्ध या टकराव नहीं चाहता. यह स्पष्टिकरण खुद राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने किया है. ईरान के सरकारी समाचार एजेंसी के अनुसार, उन्होंने यह बात ईद-उल-फितर और नवरोज के अवसर पर दिए गए अपने संदेश में कही.
ईद-उल-फितर जहां रमजान के महीने के समापन का प्रतीक है, वहीं नवरोज 21 मार्च को मनाया जाने वाला ईरानी नववर्ष है.राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने हाल के दिनों में ईरान और कुछ अरब देशों के बीच बढ़ते तनाव पर भी बात की.
उन्होंने कहा कि “हम मुस्लिम देशों के साथ किसी भी तरह का मतभेद नहीं चाहते. हम न तो संघर्ष चाहते हैं और न ही युद्ध. वे हमारे भाई हैं.” उन्होंने इन तनावों के लिए संयुक्त राज्य और इजरायल को जिम्मेदार ठहराया.
ईरान पड़ोसी देशों के साथ सभी विवादों काे सुलझाने के लिए तैयार
उन्होंने आगे कहा कि ईरान अपने पड़ोसी देशों के साथ सभी विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने के लिए तैयार है. इसके साथ ही उन्होंने मध्य पूर्व में मुस्लिम देशों का एक साझा सुरक्षा ढांचा बनाने का प्रस्ताव भी रखा, जिससे क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित की जा सके.
राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने कहा कि “हमें इस क्षेत्र में बाहरी शक्तियों की जरूरत नहीं है. हम मुस्लिम देशों के सहयोग से एक इस्लामिक असेंबली बना सकते हैं, जिसके तहत हम अपनी सुरक्षा, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों को बेहतर तरीके से संचालित कर सकते हैं.”
परमाणु हथियारों के मुद्दे का भी किया जिक्र
परमाणु हथियारों के मुद्दे पर भी उन्होंने अपनी स्थिति साफ की. उन्होंने कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में नहीं बढ़ रहा है. उन्होंने बताया कि देश के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई पहले ही एक धार्मिक आदेश जारी कर चुके हैं, जिसमें परमाणु हथियारों पर रोक लगाई गई है. ऐसे में कोई भी अधिकारी इस दिशा में कदम नहीं उठा सकता.हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका दुनिया को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा है कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है.
बता दें कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से तेहरान और ईरान के कई अन्य शहरों पर हमले किए थे. इन हमलों में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता, कई वरिष्ठ सैन्य कमांडर और आम नागरिकों की मौत हो गई थी. इसके जवाब में ईरान ने भी मिसाइल और ड्रोन हमलों की शृंखला शुरू कर दी, जिसमें इजरायल और मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया.
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