शनि, सूर्य और शुक्र में छिपा है आनंद का रहस्य, जानिए कौन से ग्रह देते हैं ब्रह्मानन्द और परमानन्द

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Astro news: मानव जीवन का 84 लाख योनियों तथा कर्मक्षेत्र मृत्यु लोक से विशेष सम्बन्ध है. उत्थान-पतन, चतुर्षुरुषार्थों में मोक्ष की प्राप्ति तथा साधना मुख्य लक्ष्य है. मृत्यु लोक में विषय की व्यापकता उनकी अनेकता और सिद्धि के फलस्वरूप आनन्द की प्राप्ति और उसकी तृप्ति दृष्टिगत होती है. विषय कर्म क्षेत्र, कार्य क्षेत्र और क्रिया क्षेत्र से अत्यन्त व्यापक है. ऐसे में मन से किया हुआ कार्य वाणी से सम्बोधित क्रिया होती है.

कहा जाता है कि कर्म शारीरिक सम्पन्नता रूपी श्रमकर्म होता है. मनसा वाचा कर्मणा का सार भूत सत्कर्म है. जो शुभ ग्रह और स्थानादि द्वारा पूर्व निर्धारित साक्षीभूत ग्रह से मिलता है. मनसा, वाचा कर्मणा में से किसी की हानि करके अशुभ ग्रहादि के प्रभाव से जो कर्म होते हैं वे असतकर्म की संज्ञा में आते हैं. ये लौकिक जगत तथा पारलौकिक दोनों में निन्दनीय होते हैं यानि विषयानन्द में विवेक रूपी ज्ञान एवं ग्रह की विवेचना से विषय निर्धारण तथा उसकी पूर्ति में त्रिपुरुषार्थ की आवश्यकता का बल देना ही आनन्द का प्रतीक है.

चिन्तन एवं अध्ययन ही ज्योतिष

ज्योतिषाचार्यो के मुताबिक, ब्रह्म जीव का सम्पर्क एवं पंच भौतिक शरीर का सारभूत कर्म लौकिक जगत में कल्याणकारी संसारोपयोगी एवं वन्दनीय होता है तो सात्विक ग्रहों द्वारा स्थानादि बल के सारभूत ब्रह्मनन्द की प्राप्ति में गुरु का स्वग्रही एवं उच्च का होना कहा गया है. ज्योतिष शास्त्र की विवेचना से उत्थान, पतन, क्रिया और कर्म का चिन्तन करना ही ग्रह जन्य परिस्थिति है, जिसका चिन्तन एवं अध्ययन ही ज्योतिष है.

हालांकि ग्रन्थकारों के मतों में अनेकता है, शनि-राहु-केतु से आत्मचिंतनजन्य आनन्द, सूर्य-बुध-मंगल से चेतना के विस्तार का ब्रह्मानन्द तथा गुरु-शुक्र-चन्द्र से दिव्य प्रेम और आध्यात्मिक तृप्ति का परमानन्द प्राप्त होने की अवधारणा ज्योतिष एवं आध्यात्मिक साहित्य में वर्णित मिलती है.

कब जातक सत्कर्म की ओर होता है प्रेरित

दरअसल, जब किसी जातक के जन्मकुण्डली में पराक्रमेश उच्च या स्वग्रही होकर केन्द्रवर्ती होता है तब वह जातक सत्कर्म की ओर प्रवृत्त होता है. अगर पराक्रमेश स्वग्रही का होकर त्रिकोण में स्थित होता है तो जातक सत् क्रियाशील होता है. परन्तु पराक्रम भाव का स्वामी पराक्रमेश नीच का होेता है तो जातक असत् कर्म, असत् कार्य और असत् क्रिया की ओर तत्परता से संलग्न होता है.

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