Chaturmas Tirth Yatra: चातुर्मास में तीर्थ यात्रा क्यों थी वर्जित? जानिए क्या है इसकी वजह

Aarti Kushwaha
Aarti Kushwaha
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Must Read
Aarti Kushwaha
Aarti Kushwaha
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Chaturmas Tirth Yatra Rules: हिंदू धर्म में सावन से लेकर कार्तिक तक का समय बेहद पवित्र माना जाता है. इन्हीं चार महीने को चातुर्मास कहा जाता हैं. आज के दौर में लोग सावन, जन्माष्टमी या गणेश उत्सव के दौरान बड़ी संख्या में लोग तीर्थ यात्रा पर निकलते हैं, लेकिन कुछ दशक पहले तक तस्वीर बिल्कुल अलग थी. साधु-संत हों या आम गृहस्थ, चातुर्मास में लंबी तीर्थ यात्राएं करना लगभग वर्जित माना जाता था.
धार्मिक मान्यता यह थी कि इस समय भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और साधु एक ही स्थान पर निवास करके साधना करते हैं. वहीं इसके पीछे मौसम, स्वास्थ्य और प्रकृति से जुड़ी व्यावहारिक वजहें भी थीं. ऐसे में चलिए जानते कि आखिर क्यों चार महीनों तक यात्रा रोकने की परंपरा बनी और आज इसका क्या महत्व है?

चातुर्मास क्या है और कब होती है इसकी शुरुआत?

बता दें कि चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है, से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी तक चलता है. इन चार महीनों को भगवान विष्णु के विश्राम का काल माना जाता है. वहीं, धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, इस अवधि में शुभ मांगलिक कार्य सीमित कर दिए जाते हैं. इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और बड़े उत्सवों की बजाय पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत और आत्मचिंतन पर अधिक जोर दिया जाता है.

चातुर्मास में साधु-संत क्यों नहीं करते थे तीर्थ यात्रा?

सनातन परंपरा में साधु-संत पूरे साल भ्रमण करते थे और लोगों को धर्म का संदेश देते थे. लेकिन चातुर्मास शुरू होते ही वो किसी आश्रम, मंदिर या गांव में ठहर जाते थे. इसे चातुर्मास व्रत या वर्षावास भी कहा जाता है. मान्यता थी कि लगातार यात्रा करने की बजाय इन चार महीनों में मन और इंद्रियों को स्थिर करके साधना करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है. इसी दौरान शास्त्रों का अध्ययन, कथा-प्रवचन और ध्यान की विशेष परंपरा निभाई जाती थी.

भगवान विष्णु की योगनिद्रा से जुड़ी मान्यता

पुराणों के मुताबिक, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं. इसलिए इस समय बाहरी गतिविधियों की बजाय भक्ति और संयम को अधिक महत्व दिया गया. साधु-संत भी इसे ईश्वर के विश्राम का काल मानकर यात्रा रोक देते थे.

आम लोगों के लिए भी क्यों थी यह परंपरा?

बारिश का मौसम था सबसे बड़ी वजह

पहले के समय न सड़कें थीं, न आधुनिक यातायात के संसाधन. वहीं चातुर्मास का महिना पूरी तरह मानसून के मौसम में आता है. ऐसे में तेज बारिश, उफनती नदियां, कीचड़ और जंगलों से होकर यात्रा करना बेहद कठिन और जोखिम भरा और जान-माल का खतरा बढ़ाने वाला होता था. इसलिए धर्म ने भी लोगों को घर या आसपास रहकर पूजा करने की सलाह दी.

छोटे जीवों की रक्षा का संदेश

बारिश के मौसम में धरती पर असंख्य छोटे-छोटे जीव-जंतु और कीड़े-मकोड़े जन्म लेते हैं. पैदल यात्रा के दौरान उनके कुचलने की संभावना रहती थी. अहिंसा की भावना को ध्यान में रखते हुए साधु-संत इस मौसम में भ्रमण से बचते थे. यह परंपरा प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश भी देती है.

धार्मिक नियम के पीछे छिपा वैज्ञानिक दृष्टिकोण

चातुर्मास की परंपरा केवल आस्था तक सीमित नहीं थी. आयुर्वेद भी कहता है कि वर्षा ऋतु में पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है. इस मौसम में संक्रमण और जलजनित बीमारियों का खतरा अधिक रहता है. यात्रा के दौरान भोजन और पानी की शुद्धता बनाए रखना मुश्किल होता था. इसलिए लोगों को संयमित भोजन, व्रत और कम यात्रा की सलाह दी जाती थी. यह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी माना गया.
Latest News

भारत खरीदेगा US का घातक ‘जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम’, दोनों देशों के रक्षा संबंधों को और मिलेगी मजबूती

New Delhi: भारत युद्ध में परखी जा चुकी अमेरिकी ‘जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम’ को खरीदने की योजना बना रहा...

More Articles Like This