दुनिया की अनोखी जनजाति: यहां सिक्स पैक नहीं, बड़ी तोंद वाले पुरुष माने जाते हैं सबसे आकर्षक

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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आज के समय में फिटनेस का मतलब सिक्स पैक एब्स, चौड़ी छाती और मस्कुलर बॉडी माना जाता है. जिम में पसीना बहाकर शरीर को फिट और आकर्षक बनाना एक ट्रेंड बन चुका है. खासकर युवाओं के बीच सुडौल शरीर को ही सुंदरता और पर्सनालिटी का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है. लेकिन दुनिया में एक ऐसी जगह भी है जहां फिटनेस की परिभाषा बिल्कुल उल्टी है. यहां जितना बड़ा पेट, उतनी ज्यादा खूबसूरती और आकर्षण माना जाता है.

इथियोपिया की ओमो घाटी में बसती है यह जनजाति

यह अनोखी परंपरा Bodi Tribe में देखने को मिलती है, जो Omo Valley में रहती है. इस जनजाति की जीवनशैली और सोच आधुनिक दुनिया से बिल्कुल अलग है. यहां के लोगों के लिए मर्दानगी, ताकत और आकर्षण का मतलब शरीर की बनावट नहीं, बल्कि पेट का आकार होता है. जितनी बड़ी और बाहर निकली हुई तोंद, उतना ही ज्यादा सम्मान उस व्यक्ति को मिलता है.

‘काएल उत्सव’ में होता है अनोखा मुकाबला

इस जनजाति में हर साल ‘काएल उत्सव’ नाम का एक खास त्योहार मनाया जाता है. यह त्योहार किसी साधारण जश्न जैसा नहीं होता, बल्कि एक तरह का अनोखा मुकाबला होता है. इसमें केवल वे पुरुष हिस्सा लेते हैं, जिनकी तोंद बड़ी होती है. इस दिन पूरे कबीले के लोग इकट्ठा होते हैं और इस प्रतियोगिता को देखते हैं.

जिस पुरुष का पेट सबसे बड़ा और गोल होता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है. यह जीत सिर्फ एक प्रतियोगिता जीतने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उस व्यक्ति की सामाजिक पहचान और सम्मान को भी तय करती है. विजेता को कबीले में ‘हीरो’ जैसा दर्जा मिल जाता है और कई बार उसे जीवनसाथी चुनने में भी विशेष महत्व दिया जाता है.

6 महीने तक चलती है खास तैयारी

इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाले पुरुषों के लिए तैयारी किसी खेल प्रतियोगिता से कम नहीं होती, लेकिन तरीका बिल्कुल अलग होता है. प्रतिभागी करीब 6 महीने पहले से ही एक तरह की ‘ट्रेनिंग’ शुरू कर देते हैं. इस दौरान वे खुद को एक झोपड़ी या अलग स्थान पर सीमित कर लेते हैं. उन्हें किसी भी तरह का शारीरिक काम करने की अनुमति नहीं होती.

उनका मुख्य उद्देश्य होता है ज्यादा से ज्यादा खाना और आराम करना, ताकि उनका वजन तेजी से बढ़ सके. यह प्रक्रिया काफी कठिन मानी जाती है, क्योंकि शरीर को लगातार भारी भोजन के साथ ढालना आसान नहीं होता.

डाइट इतनी अलग कि सुनकर हैरानी होगी

इस जनजाति की डाइट भी उतनी ही अनोखी है जितनी उनकी परंपरा. तोंद बढ़ाने के लिए ये पुरुष गाय के दूध में उसका ताजा खून मिलाकर पीते हैं. यह सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन यह उनके लिए एक परंपरागत तरीका है. खास बात यह है कि वे गाय को मारते नहीं हैं, बल्कि उसकी नस से थोड़ा खून निकालकर बाद में घाव को बंद कर देते हैं. उनका मानना है कि यह मिश्रण शरीर को जल्दी मोटा करने में मदद करता है और पेट को तेजी से बढ़ाता है.

उत्सव के दिन का खास दृश्य

काएल उत्सव के दिन का माहौल बेहद खास होता है. सभी प्रतिभागी अपने शरीर पर मिट्टी और राख लगाते हैं और पारंपरिक नृत्य करते हैं. पूरा कबीला इस कार्यक्रम का हिस्सा बनता है और उत्साह के साथ इसे देखता है. इसके बाद कबीले के बुजुर्ग प्रतिभागियों का निरीक्षण करते हैं और पेट के आकार के आधार पर विजेता का चयन करते हैं. जिस व्यक्ति का पेट सबसे बड़ा और आकर्षक माना जाता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है.

विजेता को मिलता है जीवनभर सम्मान

इस प्रतियोगिता को जीतने वाले व्यक्ति को कबीले में विशेष सम्मान मिलता है. उसे समाज में अलग पहचान दी जाती है और कई बार उसे सबसे योग्य पुरुष माना जाता है. हालांकि दिलचस्प बात यह है कि यह सम्मान हमेशा के लिए नहीं रहता, क्योंकि समय के साथ शरीर सामान्य हो जाता है, लेकिन उस जीत की पहचान जीवनभर बनी रहती है.

क्या कहती है यह परंपरा

यह जनजाति हमें यह समझाती है कि सुंदरता और आकर्षण के मायने हर समाज में अलग-अलग हो सकते हैं. जहां आधुनिक दुनिया में फिट और मस्कुलर शरीर को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं बोडी जनजाति में बड़ा पेट ही गर्व, ताकत और सुंदरता का प्रतीक है.

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