पुष्कर (राजस्थान): परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने अपने प्रवचन में मानव जीवन में पाप से बचने और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि मनुष्य को पाप से अत्यंत सावधान रहना चाहिए, क्योंकि पाप धीरे-धीरे और अनजाने में मन, वाणी और इंद्रियों पर नियंत्रण कर लेता है.
मोरारी बापू ने कहा कि पाप मुलायम सर्प की तरह धीरे-धीरे मनुष्य की आँख, जीभ और मन पर दबाव बनाता है और व्यक्ति को गलत रास्ते की ओर ले जाता है. ऐसे में आवश्यक है कि व्यक्ति अपने मन, वाणी और इंद्रियों पर संयम रखे.
पाप को छिपाना नहीं, स्वीकार करना जरूरी
उन्होंने कहा कि अनजाने में किए गए पापों को छिपाने के बजाय उन्हें स्वीकार कर सुधार करना चाहिए. उनके अनुसार छिपाए गए पाप का बोझ चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ता जाता है और अंततः मनुष्य को भारी कष्ट झेलने पड़ते हैं.
मोरारी बापू ने कहा कि जब व्यक्ति अपने दोषों को स्वीकार करता है और सुधार का प्रयास करता है, तभी वह आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ सकता है.
धन का सदुपयोग ही सच्चा धर्म
अपने प्रवचन में उन्होंने धन और धर्म के संबंध पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि पैसा कमाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उसका सही उपयोग करना सबसे कठिन कार्य है.
उन्होंने कहा कि यदि लक्ष्मी को माता मानकर धन का उपयोग सत्कर्मों और सेवा के कार्यों में किया जाए, तो जीवन धन्य हो जाता है. वहीं, यदि धन का उपयोग केवल भोग-विलास और स्वार्थ के लिए किया जाए, तो इसका दुष्परिणाम भी भुगतना पड़ता है.
धर्म ही जीवन का वास्तविक आधार
मोरारी बापू ने कहा कि मनुष्य को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि यौवन और संपत्ति स्थायी नहीं होते. जीवन में सबसे महत्वपूर्ण धर्म और सदाचार है.
उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को धर्म के मार्ग पर चलने और सत्कर्मों के माध्यम से समाज की सेवा करने का संदेश दिया. अंत में उन्होंने पुष्कर आश्रम और गोवर्धनधाम आश्रम की ओर से सभी हरि भक्तों के लिए मंगलकामनाएं व्यक्त कीं.

