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The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, श्री सुदामा जी भगवान् श्रीकृष्ण के बाल सखा थे। उन्होंने अवंतिका पुरी में संदीपनी मुनि के आश्रम पर भगवान के साथ गुरुकुल में विद्या अध्ययन किया था। भगवान श्रीकृष्ण विद्याध्ययन करके मथुरा वापस आ गये और श्रीसुदामा जी अपने पैतृक गांव गुजरात में पहुंच गये। कुछ दिन बाद भगवान ने द्वारिका को अपनी राजधानी बना लिया। भगवान चाहते हैं कि सुदामा मेरे पास आये, परन्तु सुदामा जी संकोच बस कभी नहीं गये।
तब भगवान ने सन्यासी का रूप धारण करके उनकी पत्नी सुशीला को प्रेरित किया सुदामा को द्वारिका भेजना। श्रीसुदामाजी सुशीला जी के प्रेरित करने पर भगवान से मिलने द्वारिका गये। भगवान ने एक मुट्ठी तन्दुल खाकर सुदामा के सारे कष्ट को समाप्त कर दिया और दूसरी मुट्ठी तंदुल खाकर श्री सुदामा जी को अपने जैसा ऐश्वर्य प्रदान किया। इस संसार में जीव तभी तक दुःख पाता है। जब तक भगवान की शरण नहीं लेता। भगवान की शरण लेने के बाद, भगवान उसका योग क्षेम स्वयं बहन करते हैं। योग का अर्थ होता है जो उसके पास नहीं है उसे भगवान प्रदान करते हैं और
क्षेम का अर्थ होता है जो उसके पास है, उसकी भगवान रक्षा करते हैं। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।