Reporter
The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, त्रिपुरासुर की कथा आती है। तारकासुर जिसका उद्धार भगवान कार्तिकेय के द्वारा हुआ। उसके तीन पुत्र थे, तारकाक्ष बिंदुन्माली और कमलाक्ष। तारकासुर की मृत्यु के बाद ये दानव जाति के राजा बनें। इन्होंने सुमेरु पर्वत की कंदरा में खड़े होकर बड़ा कठिन तप किया। और
श्रीब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया। आगे चलकर यही त्रिपुरासुर कहलाये। प्राप्त सुखों का जब तक हम त्याग नहीं करते हैं तब तक अप्राप्त की प्राप्ति नहीं होती है। देवता दानव, मानव किसी ने भी शक्ति प्राप्त किया है तो उसके पीछे उसका तप है। तप के बिना शक्ति प्राप्त करना असम्भव है। बस अन्तर इतना है कि प्राप्त शक्ति का सदुपयोग किया या दुरुपयोग किया। शक्ति भगवान राम में भी थी, रावण में भी थी लेकिन रावण ने शक्ति का दुरुपयोग किया इसलिए राक्षस कहलाया और भगवान श्री राम ने शक्ति का सदुपयोग किया इसलिए जगतबन्द्य हुये।
वरदान पाकर त्रिपुरासुर ने बहुत अत्याचार किया।
कहु रहीम कैसे पटे केर वेर को संग।
वे झूमें रस आपने उनके फाटें अंग।।
केला और बेर के पेड़ के मित्रता निभ नहीं सकती। क्योंकि जरा सी हवा चलेगी, वेर का वृक्ष अपने आनन्द में झूमेगा केले के पत्ते फट जाएंगे। सज्जनों और दुर्जनों में मेल नहीं रह सकता क्योंकि दुर्जन मनमाना आचरण करते हैं जिसमें सज्जन बाधा बनते हैं, यही लड़ाई है और कोई दूसरी लड़ाई नहीं है। लेकिन यह लड़ाई शुरू से है और हमेशा रहेगी। त्रिपुरासुर के उपद्रव से दुःखी होकर देवता, साधु-संत और सज्जनों की प्रार्थना से भगवान शंकर ने उसका उद्धार किया और त्रिपुरारी कहलाये। युद्धखण्ड में जलंधर, शंखचूड़, अंधकासुर, बाणासुर आदि की कथा का वर्णन किया गया है।
माता पार्वती और शिव जी ने श्री कार्तिकेय जी और गणेश जी से कहा कि जो धरती की परिक्रमा करके पहले आयेगा उसका विवाह पहला होगा। कार्तिकेय धरती की परिक्रमा में चले गये लेकिन बुद्धिमान गणेश जी ने विचार किया सन्तान के लिए धरती माता-पिता ही हैं। माता-पिता रूपी धरती पर सन्तान का जन्म होता है, इसीलिए माता-पिता की परिक्रमा किये। और विश्वरूप प्रजापति की कन्या सिद्ध- बुद्धि के साथ श्री गणेश जी का विवाह हुआ।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।