इन्द्रियों पर विजय ही आध्यात्मिक जीवन की पहली सीढ़ी: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, जहां राम तहां काम नहीं, जहां काम नहिं राम। तुलसी कबहुं की रहि सके, रवि रजनी एक ठाम।।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कामादि विकारों को शत्रु बताते हैं- “जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।” आंख और कान के दरवाजे पर सात्विकता की चौकीदार नियुक्त करो। काम कच्चा सुख है, सच्चा सुख श्री राम हैं।
काम है तो शत्रु, किन्तु मित्र जैसा दिखावा करके धोखा देता है। काम ही जीव को बन्धन में डालता है, काम ही जीव को ईश्वर से विमुख करता है, काम ही जीव को रुलाता है।
अतिशय विलासी लोगों से तो भगवान भी दूर भागते हैं। अति कामी का संग ही बड़ा कुसंग है। उससे बचते रहो। जीव प्रकृति का दास बनकर घूमता है, इसीलिए दुःखी होता है। शिव प्रकृति के पति हैं, इसीलिए वे उसे बस में रख सकते हैं। जो इन्द्रियों का दास है, उसके प्रति परमात्मा सदा उदास रहता है।
जो इन्द्रिय वृत्तियों को बढ़ावा देता है, उसे पछताना पड़ता है। इन्द्रिय वृत्तियों के नौकर नहीं, मालिक बनो। संसार के सुखों से  सुख जरूर मिलता है, पर शान्ति नहीं मिलती।सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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