Maa Chhinnamasta: दस महाविद्याओं में मां छिन्नमस्ता का स्वरूप सबसे रहस्यमयी और अद्भुत माना जाता है. पहली बार इस स्वरूप को देखने वाले अधिकांश लोगों के मन में एक ही सवाल उठता है कि आखिर माता ने अपना ही सिर क्यों काट लिया था. उनके एक हाथ में कटा हुआ मस्तक, दूसरे हाथ में खड्ग, शरीर से निकलती रक्त की तीन धाराएं और दोनों ओर खड़ी डाकिनी-शाकिनी का यह स्वरूप आखिर किस आध्यात्मिक संदेश का प्रतीक है? आइए जानते हैं मां छिन्नमस्ता से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाएं और उनके गूढ़ अर्थ.
कौन हैं मां छिन्नमस्ता?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां छिन्नमस्ता देवी दुर्गा का अत्यंत उग्र और दिव्य स्वरूप हैं. उन्हें दस महाविद्याओं में छठी महाविद्या माना जाता है. इस स्वरूप में माता अपने एक हाथ में अपना कटा हुआ सिर और दूसरे हाथ में खड्ग धारण किए रहती हैं. उनके गले में मुंडमाला सुशोभित रहती है. माता के दोनों ओर उनकी सहचरियां डाकिनी और शाकिनी खड़ी रहती हैं, जो उनके शरीर से निकलने वाली रक्तधाराओं का पान करती हैं. तीसरी रक्तधारा स्वयं माता के कटे हुए मुख में प्रवेश करती है.
जब सहचरियों की भूख मिटाने के लिए माता ने कर दिया महात्याग
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता दुर्गा अपनी दोनों सहचरियों डाकिनी और शाकिनी के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गई थीं. स्नान के बाद दोनों सहचरियों को इतनी तीव्र भूख लगी कि उनका शरीर काला पड़ने लगा. उन्होंने माता से भोजन की प्रार्थना की. माता ने पहले उन्हें कुछ समय प्रतीक्षा करने के लिए कहा, लेकिन जब दोनों ने कहा, “कि मां तो अपने बच्चों की भूख तुरंत शांत करती हैं, अत: आप हमारी रक्षा करें मां.” तब माता का हृदय वात्सल्य से भर उठा.
अपनी सहचरियों की पीड़ा दूर करने के लिए माता ने तुरंत अपनी खड्ग से अपना ही शीश काट दिया. सिर कटते ही उनके शरीर से रक्त की तीन धाराएं निकलीं. दो धाराएं डाकिनी और शाकिनी के मुख में पहुंचीं, जिससे उनकी भूख शांत हो गई. वहीं तीसरी धारा स्वयं माता के कटे हुए मुख में प्रवाहित हुई. मान्यता है कि इसी महात्याग के कारण देवी का यह स्वरूप ‘छिन्नमस्ता’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
कामदेव और रति के ऊपर खड़े होने का क्या है अर्थ?
मां छिन्नमस्ता की प्रतिमा में उन्हें कामदेव और रति के ऊपर खड़ा दिखाया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह दृश्य इस बात का प्रतीक है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए मनुष्य को काम, वासना, मोह और भौतिक इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त करना आवश्यक है. जब तक व्यक्ति इन बंधनों से ऊपर नहीं उठता, तब तक उच्च आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं मानी जाती.
मां छिन्नमस्ता के अवतार की दूसरी पौराणिक कथा
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, जब राक्षसों के अत्याचार से देवता परेशान हो गए, तब माता पार्वती ने उनका संहार करने के लिए ‘छिन्नमस्तिका’ स्वरूप धारण किया. इस रूप में माता ने राक्षसों का विनाश किया, लेकिन उनका क्रोध इतना प्रचंड हो गया कि निर्दोष भी उसके प्रभाव में आने लगे. भयभीत देवताओं ने भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की. इसके बाद भगवान शिव माता के पास पहुंचे. माता छिन्नमस्तिका ने भगवान शिव से कहा, “हे नाथ! मेरी भूख शांत नहीं हो पा रही है। मैं अपनी भूख कैसे संतुष्ट करूं?”
तब भगवान शिव ने कहा कि यदि वह अपनी खड्ग से अपना ही शीश काटकर अपने रक्त का पान करें, तो उनकी भूख शांत हो जाएगी. इसके बाद माता ने अपना सिर काट लिया. उनके शरीर से रक्त की तीन धाराएं निकलीं. दो धाराएं डाकिनी और शाकिनी के मुख में पहुंचीं, जबकि तीसरी धारा स्वयं माता के मुख में प्रवाहित हुई. इसके बाद उनकी भूख शांत हो गई और यह स्वरूप ‘छिन्नमस्तिका’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं. इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. The Printlines एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है.)
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