जो विष पीने को तैयार है वही कर सकता है ईश्वर की प्राप्ति: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, रासलीला, कंस का उद्धार, श्रीकृष्ण रुक्मिणी विवाह की कथा का गान किया गया आध्यात्मिक दृष्टि से रास शब्द का अर्थ होता है,” रसानां समूहः रासः ” रस आनन्द को कहते हैं। कई बार लोग कहते हैं आज कथा में बहुत रस आया, आज कीर्तन में बहुत रस आया, रस का अर्थ होता है आनंद।
 रास शब्द का अर्थ होता है जहां आनन्द। ढेर-ढेर हो रहा हो, उसे रास कहते हैं। जीव और ब्रह्म के मिलन को रास कहते हैं। कथा, कीर्तन में आनन्द तभी आता है जब मन परमात्मा से जुड़ जाता है। कंस उद्धार की कथा में भगवान व्यास कहते हैं कि- कंस मूर्तिमान कलियुग का स्वरूप है।
कंस के उद्धार की कथा सुनने से कलियुग व्याप्त नहीं होता। जीवन में दोषों से छुटकारा मिल जाता है।द्वारिका लीला में भगवान के विवाह की कथा सुनाया। भगवान श्रीकृष्ण साक्षात् परमात्मा है। श्रीरुक्मिणी देवी साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप हैं। राजा भीष्मक समुद्र है और रुक्मी विष है। समुद्र मंथन में विष भी निकाला और माता लक्ष्मी भी प्रकट हुई हैं। इस तरह भीष्म के यहां माता लक्ष्मी रुक्मिणी देवी के रूप में प्रकट हुई।
भगवान तो स्वयं परमात्मा है और  श्रीरुक्मिणी जी का भाई यह विष है। भगवान को पाने के लिए विष भी पीना पड़ता है और ईश्वर की प्राप्ति वही कर सकता है जो विष पीने को तैयार है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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