पुष्कर/राजस्थान: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने सत्संग और कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्संग गंगा नदी के समान पवित्र होता है और इसके माध्यम से मनुष्य के जीवन में अद्भुत परिवर्तन संभव है. उन्होंने कहा कि कथा व्यक्ति के लिए माता के समान होती है, क्योंकि इसके माध्यम से भक्ति के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति का आध्यात्मिक रूप से नया जन्म होता है.
संत मोरारी बापू ने कहा कि कथा सुनने के बाद व्यक्ति के भीतर के दोष समाप्त होने चाहिए और उसके स्वभाव में सकारात्मक बदलाव दिखाई देना चाहिए. यदि कथा सुनने के बाद भी मनुष्य के व्यवहार और विचारों में परिवर्तन नहीं आता, तो यह समझना चाहिए कि कथा का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हुआ.
कथा के बाद जागना चाहिए पश्चाताप और सेवा भाव
उन्होंने कहा कि कथा सुनने के बाद मनुष्य को अपने द्वारा किए गए पापों और गलतियों के लिए पछतावा होना चाहिए. साथ ही उसके हृदय में यह भावना जागृत होनी चाहिए कि उसके पास जो कुछ भी है वह प्रभु की देन है और वह स्वयं प्रभु का एक छोटा सा सेवक है.
अपने प्रवचन के दौरान उन्होंने भक्ति भावना को व्यक्त करते हुए कहा —
“नन्हा सा फूल हूँ मैं, चरणों की धूल हूँ मैं।
आया हूँ तेरे दरबार, प्रभु जी मेरी सेवा करो स्वीकार।”
सत्संग से जागता है विवेक
संत मोरारी बापू ने कहा कि सत्संग के बिना न तो विवेक जागृत होता है और न ही व्यक्ति को अपने दोषों का सही आभास होता है. सत्संग मनुष्य को आत्मचिंतन का अवसर देता है और उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.
उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति प्रभु और परोपकार के लिए कष्ट सहता है, उसे जीवन में कभी पछताना नहीं पड़ता.
भक्ति के लिए भी जरूरी है प्रयास
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार लोग सांसारिक सुखों को प्राप्त करने के लिए मेहनत करते हैं और पसीना बहाते हैं, उसी प्रकार परमात्मा की प्राप्ति के लिए भी प्रयास करना आवश्यक है. जब मनुष्य अपनी इच्छा को प्रभु की इच्छा में मिला देता है, तभी उसकी भक्ति सच्चे अर्थों में बढ़ती है और जीवन का कल्याण होता है.
अंत में संत मोरारी बापू ने पुष्कर आश्रम और गोवर्धनधाम आश्रम की ओर से सभी हरि भक्तों और श्रद्धालुओं को शुभ मंगलकामनाएं दीं.

