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Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, सबसे पहले हम लोग विचार करेंगे कि-इस महापुराण का नाम भागवत क्यों रखा गया? इस प्रश्न के उत्तर में अनेक संतों का अलग-अलग भाव है-एक संत कहते हैं- “भगवता अयं भागवतम्” भगवान श्री राधा कृष्ण भक्तों का कल्याण करने के लिए स्वयं ही भागवत के रूप में प्रकट हुए हैं श्रीमद्भागवत महापुराण और भगवान में रंचमात्र अन्तर नहीं है।
“भगवता उदितं भागवतम् ।” भगवान ही भागवत के रूप में प्रकट हुए हैं।
श्रीमद्भागवताख्योऽयं प्रत्यक्ष: कृष्ण एव हि।
स्वीकृतोऽसि मयानाथ मुक्त्रर्थं भवसागर।।
“भगवता प्रोक्तं भगवतम् ” भगवान नारायण ने सबसे पहले इसे गाया, इसलिए इसका नाम भागवत है। भगवान नारायण ने भागवत का ज्ञान अपने पुत्र ब्रह्मा जी को दिया, ब्रह्मा जी ने नारद जी को प्रदान किया। नारद जी से भगवान व्यास को यह ज्ञान प्राप्त हुआ, भगवान व्यास से श्री शुकदेव जी को यह अद्भुत ज्ञान प्राप्त हुआ। श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को भागवत सुनाया तो यह अद्भुत ज्ञान पूरे संसार को प्राप्त हुआ। इसके सबसे पहले गायक भगवान नारायण हैं इसलिए इसका नाम भागवत है।
“भक्तानां चरित्राणां भागवतम्।”इस महान धर्मग्रंथ में भगवान के साथ-साथ भगवान के भक्तों का मंगलमय चरित्र है, इसलिए इसका नाम भागवत है। भागवतशब्द में चार अक्षर हैं, एक-एक अक्षर से एक-एक विशेष गुण जिससे मानव जीवन ऊंचाई को प्राप्त करता है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और त्याग जहां चारो की प्राप्ति होती है।
पितरों की प्रसन्नता के लिये भागवत से बड़ा कोई अनुष्ठान नहीं है। भागवत श्रवण से तीन पीढ़ियों को पुण्य प्राप्त होता है, जो भागवत श्रवण करता है उसको तो सुनने का पुण्य मिलता ही है, साथ में उसके पितरों को भी पुण्य प्राप्त होता है और उसके बच्चों का भी मंगल होता है। श्रीमद्भागवत महापुराण कल्पवृक्ष है। श्रोता, वक्ता, यजमान सबकी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।