शादी में हो रही है लगातार देरी, कहीं कुंडली में इन ग्रहों का प्रभाव तो नही?

Aarti Kushwaha
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Vivah Mein Deri Ke Yog: शादी की बात चलना, अच्छे रिश्ते आना और फिर किसी न किसी वजह से बात आगे न बढ़ पाना कई लोगों के लिए उलझन भरा अनुभव हो सकता है. कभी परिवार की सहमति नहीं बनती, तो कभी दो लोगों के विचार नहीं मिलते, कभी-कभी तो रिश्ता तय होने के बाद भी टूट जाता है, जबकि कई बार सही साथी मिलने के बावजूद फैसला लेने में समय लगता है. ऐसे में मन में सवाल उठता है कि आखिर शादी में बार-बार देरी क्यों हो रही है?

दरअसल, ज्योतिष में विवाह से जुड़ी परिस्थितियों को समझने के लिए कुंडली के सातवें भाव, उसके स्वामी ग्रह और विवाह के कारक माने जाने वाले ग्रहों की स्थिति का विश्लेषण किया जाता है. वैदिक ज्योतिषियो के अनुसार, कुंडली में कुछ ग्रहों का प्रभाव विवाह में देरी या रिश्तों से जुड़ी चुनौतियों का कारण हो सकता है.

शनि का प्रभाव

वैदिक ज्योतिष में शनि को धैर्य, अनुशासन और जिम्मेदारी से जोड़कर देखा जाता है. यदि कुंडली में शनि के प्रभाव सातवें भाव या उसके स्वामी पर हो, तो इसे विवाह में देरी के संभावित ज्योतिषीय संकेतों में गिना जाता है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति को रिश्ते मिलने के बावजूद विवाह तक पहुंचने में समय लग सकता है. इस दौरान करियर की प्राथमिकताएं, पारिवारिक जिम्मेदारियां या सही निर्णय लेने में लगने वाला समय शादी की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है.

राहु का प्रभाव

राहु को ज्योतिष में अप्रत्याशित परिस्थितियों और भ्रम से संबंधित माना जाता है. विवाह से जुड़े भावों पर इसका प्रभाव होने पर रिश्तों में अनिश्चितता या असामान्य परिस्थितियों की व्याख्या की जाती है. जैसे कोई रिश्ता शुरुआत में तेजी से आगे बढ़े, लेकिन बाद में अपेक्षाओं में अंतर या किसी गलतफहमी के कारण बातचीत रुक जाए. हालांकि, हर टूटते रिश्ते या अचानक बदली परिस्थिति को राहु के प्रभाव से जोड़ना उचित नहीं है. वास्तविक जीवन में संवाद की कमी और आपसी असहमति भी इसकी वजह हो सकती है.

केतु का प्रभाव

केतु को वैराग्य और आंतरिक दूरी से जोड़कर देखा जाता है. विवाह संबंधी ज्योतिषीय विश्लेषण में इसका प्रभाव व्यक्ति के मन में संशय, भावनात्मक दूरी या रिश्ते के प्रति अनिश्चितता के रूप में समझा जाता है. जैसे रिश्ता अनुकूल होने के बावजूद व्यक्ति को भावनात्मक जुड़ाव महसूस न हो या वह बार-बार अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे. ऐसी स्थिति में अपनी अपेक्षाओं, प्राथमिकताओं और भावनाओं को समझना भी जरूरी है.

मंगल का प्रभाव

मंगल ऊर्जा, साहस और आक्रामकता से जुड़ा ग्रह माना जाता है. वैवाहिक भावों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव होने की स्थिति में ज्योतिषीय परंपरा के अनुसार, बहस, जल्दबाजी या आपसी मतभेदों की संभावना पर विचार किया जाता है. ऐसे में विवाह से जुड़े किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए केवल मंगल की स्थिति देखना पर्याप्त नहीं है. रिश्ते में संवाद, स्वभाव और एक-दूसरे के प्रति सम्मान जैसे व्यावहारिक पहलुओं को समझना भी जरूरी है.

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