Auto LPG Retrofit Policy: क्या आपकी पुरानी पेट्रोल या डीजल कार भविष्य में Auto LPG पर चल सकती है? देश में तेजी से बढ़ते प्रदूषण और सेकेंड-हैंड कारों के बढ़ते बाजार के बीच अब इंडस्ट्री ने सरकार के सामने एक बड़ा प्रस्ताव रखा है. इंडस्ट्री का कहना है कि अगर पुरानी पेट्रोल और डीजल गाड़ियों को समयबद्ध तरीके से Auto LPG में बदला जाए, तो न सिर्फ प्रदूषण में बड़ी कमी आएगी, बल्कि लोगों का ईंधन खर्च भी घट सकता है. खासकर दिल्ली-एनसीआर जैसे प्रदूषण प्रभावित शहरों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलने की उम्मीद जताई गई है.
सरकार से राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति लागू करने की मांग
भारत में ऑटो एलपीजी को बढ़ावा देने वाली प्रमुख संस्था इंडियन ऑटो एलपीजी कोएलिशन (IAC) ने सरकार से इस्तेमाल में मौजूद पेट्रोल और डीजल वाहनों को Auto LPG में बदलने के लिए समयबद्ध राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति लागू करने की मांग की है. संगठन का कहना है कि देश में हर साल करीब 60 लाख सेकेंड-हैंड कारों की बिक्री हो रही है. ऐसे में एक समर्पित रेट्रोफिट नीति की जरूरत पहले से कहीं अधिक है.
प्रदूषण कम करने में मिल सकती है बड़ी मदद
उद्योग संगठन के मुताबिक, यह नीति देश के तेजी से बढ़ते प्री-ओन्ड वाहन बाजार को वायु प्रदूषण कम करने और एयर क्वालिटी सुधारने का प्रभावी माध्यम बना सकती है. संगठन का मानना है कि खासकर दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रदूषण प्रभावित शहरों में इसका बड़ा सकारात्मक असर देखने को मिल सकता है.
2030 तक 1 करोड़ के पार पहुंच सकता है बाजार
रिपोर्ट में उद्योग के अनुमानों का हवाला देते हुए कहा गया है कि 2023 में करीब 46 लाख सेकेंड-हैंड वाहनों का कारोबार हुआ था. यह आंकड़ा 2030 तक 1 करोड़ से अधिक पहुंच सकता है. इस दौरान सेकेंड-हैंड वाहन बाजार की वार्षिक औसत वृद्धि दर (CAGR) 12 से 13 प्रतिशत रहने का अनुमान है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में हर नई कार की बिक्री के मुकाबले एक से अधिक पुरानी गाड़ियों का स्वामित्व बदलता है.
करोड़ों वाहनों को बदलने से घट सकता है प्रदूषण
रिपोर्ट के अनुसार, अगर भारतीय सड़कों पर चल रहे करोड़ों पेट्रोल और डीजल वाहनों में से केवल एक हिस्से को भी Auto LPG में बदला जाए, तो वायु प्रदूषण में बड़ी कमी लाई जा सकती है. विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रदूषण प्रभावित शहरों में इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जब तक इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और हाइड्रोजन जैसी दीर्घकालिक तकनीकों का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल नहीं होने लगता, तब तक रेट्रोफिटमेंट उत्सर्जन कम करने का सबसे तेज और व्यावहारिक समाधान साबित हो सकता है.
क्या बोले IAC के महानिदेशक?
IAC के महानिदेशक सुयश गुप्ता ने कहा, “यदि भारत ऐसे ईंधन का उपयोग करता है जो पेट्रोल की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत सस्ता है और पार्टिकुलेट मैटर, हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स) का उत्सर्जन भी काफी कम करता है, तो सड़कों पर चल रहे मौजूदा वाहनों से होने वाले प्रदूषण को तेजी से कम किया जा सकता है. इससे लाखों लोगों को बेहतर स्वास्थ्य और स्वच्छ हवा का लाभ मिलेगा, जबकि इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन जैसे दीर्घकालिक विकल्प भी समानांतर रूप से आगे बढ़ते रहेंगे.”
Auto LPG से कितना कम होगा खर्च?
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रति किलोमीटर संचालन लागत के आधार पर Auto LPG, पेट्रोल की तुलना में करीब 40 से 45% सस्ता पड़ता है. वहीं, किसी पेट्रोल या डीजल वाहन को Auto LPG में बदलने का खर्च करीब 30,000 रुपये आता है, जो इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने या अपनाने में आने वाले कई लाख रुपये के खर्च से काफी कम है.
उत्सर्जन में भी होगी बड़ी कमी
संगठन का दावा है कि Auto LPG से चलने वाले वाहन, पेट्रोल वाहनों की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड और कुल हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में लगभग 50 प्रतिशत तक कमी ला सकते हैं. इसके अलावा, इनमें नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) का उत्सर्जन भी काफी कम होता है और यह BS-VI मानकों की तय सीमा से नीचे रहता है.
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