India Space Economy: भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, निजी निवेश और औद्योगिक विकास का भी अहम आधार बनता जा रहा है. सरकार ने वर्ष 2033 तक भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. बुधवार को जारी सरकारी फैक्टशीट के अनुसार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, अंतरिक्ष स्टार्टअप में बढ़ते निवेश और नए प्रक्षेपण यानों के विकास से इस क्षेत्र को नई गति मिल रही है.
अंतरिक्ष स्टार्टअप में 618.5 मिलियन डॉलर का निवेश
भारत में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से जुड़े निजी उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सरकार और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की ओर से कई कदम उठाए जा रहे हैं. न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) ने इसरो द्वारा विकसित 83 प्रौद्योगिकियों को भारतीय उद्योगों तक पहुंचाने के लिए 118 प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं. इस पहल से निजी कंपनियों को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने और नई क्षमताएं विकसित करने का अवसर मिल रहा है. सरकारी फैक्टशीट के मुताबिक, 31 मार्च 2026 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप में कुल निवेश लगभग 618.5 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया था. ये आंकड़े भारत में एक मजबूत अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था विकसित करने की दिशा में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी को दर्शाते हैं.
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और गगनयान मिशन पर जोर
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब प्रस्तावित भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की दिशा में आगे बढ़ रहा है. स्पैडेक्स मिशन के माध्यम से भारत कक्षा में दो अंतरिक्ष यानों की स्वायत्त डॉकिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बना. यह उपलब्धि भविष्य के जटिल अंतरिक्ष अभियानों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है. वहीं, गगनयान मिशन के जरिए भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान की अपनी क्षमता विकसित कर रहा है. इन अभियानों का उद्देश्य देश को अंतरिक्ष में अधिक उन्नत वैज्ञानिक और तकनीकी गतिविधियों के लिए तैयार करना है.
8,240 करोड़ रुपये से विकसित होगा अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण यान
सितंबर 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान (NGLV) के विकास को मंजूरी दी थी. इस परियोजना के लिए 8,240 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है. इसमें विकास लागत, तीन विकासात्मक उड़ानें, जरूरी सुविधाएं, कार्यक्रम प्रबंधन और प्रक्षेपण अभियान शामिल हैं. NGLV को पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में अधिकतम 30 टन तक का भार ले जाने के लिए डिजाइन किया जा रहा है. यह क्षमता भारत के मौजूदा LVM3 प्रक्षेपण यान की 10 टन की LEO क्षमता से तीन गुना अधिक होगी.
इसके अलावा, अंतरिक्ष तक पहुंच की लागत कम करने के उद्देश्य से NGLV का आंशिक रूप से पुन: उपयोग योग्य संस्करण भी विकसित किया जा रहा है. यह संस्करण पृथ्वी की निचली कक्षा में 14 टन तक का भार ले जा सकेगा. प्रक्षेपण यान के कुछ हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल करने से भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की लागत घटाने में मदद मिल सकती है.
चंद्रमा से लेकर अंतरिक्ष स्टेशन तक के मिशनों में मिलेगी मदद
NGLV का इस्तेमाल राष्ट्रीय और वाणिज्यिक, दोनों तरह के अंतरिक्ष अभियानों के लिए किया जा सकेगा. इसके जरिए भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़े मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशनों के साथ-साथ चंद्रमा और अन्य ग्रहों की खोज से संबंधित अभियानों को भी समर्थन मिल सकेगा. इसके अलावा, यह प्रक्षेपण यान पृथ्वी की निचली कक्षा में संचार और पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों के समूह स्थापित करने में मदद करेगा. इससे भारत की अंतरिक्ष परिवहन क्षमता बढ़ने के साथ-साथ पूरे अंतरिक्ष उद्योग को लाभ मिलने की उम्मीद है.
आम लोगों की जिंदगी में भी अहम भूमिका निभा रही अंतरिक्ष तकनीक
भारत की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल अब आम नागरिकों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में भी किया जा रहा है. संचार उपग्रह दूरदराज और कम सुविधाओं वाले इलाकों में कनेक्टिविटी बढ़ाने में मदद करते हैं. वहीं, पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़ों का उपयोग कृषि, आपदा प्रबंधन, योजना निर्माण और पर्यावरण की निगरानी में किया जाता है. मौसम संबंधी उपग्रह चक्रवातों और मानसून पर नजर रखते हैं. इनके माध्यम से समय रहते चेतावनी जारी करने में मदद मिलती है, जिससे लोगों की जान और आजीविका की रक्षा की जा सकती है. किसान, मछुआरे और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय मौसम संबंधी इन सूचनाओं से लाभ उठाते हैं.
राष्ट्रीय सुरक्षा में भी योगदान दे रही अंतरिक्ष तकनीक
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों को पूरा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. अंतरिक्ष आधारित संचार प्रणालियां सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियों को समर्थन देती हैं. इसके साथ ही उपग्रहों से मिलने वाली सूचनाएं देश की निगरानी, योजना निर्माण और विभिन्न राष्ट्रीय जरूरतों में उपयोगी साबित होती हैं. सरकार का लक्ष्य निजी निवेश, घरेलू प्रौद्योगिकी विकास और उन्नत प्रक्षेपण क्षमताओं के जरिए भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है. वर्ष 2033 तक इसे 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य इसी दिशा में उठाया गया कदम है.