वैश्विक तनाव के बीच भारत बना ‘तीसरा ध्रुव’: यूरोप और कनाडा बढ़ा रहे आर्थिक व रणनीतिक सहयोग

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

अमेरिका, चीन और रूस के बीच बढ़ते वैश्विक तनाव के माहौल में यूरोप और कनाडा भारत के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को तेजी से मजबूत कर रहे हैं. एक नई रिपोर्ट में भारत को मौजूदा विश्व व्यवस्था में “एक प्रभावी तीसरा ध्रुव” बताया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, इन महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता ने ब्रुसेल्स और कनाडा को भारत के साथ साझेदारी गहराने के लिए प्रेरित किया है. भारत को ऐसा सहयोगी माना जा रहा है जो चीन की तरह भारी भू-राजनीतिक दबावों से मुक्त है, लेकिन आकार, क्षमता और बाजार के लिहाज से बेहद मजबूत विकल्प प्रदान करता है.

आर्थिक ताकत से मजबूत तीसरे ध्रुव की भूमिका

रिपोर्ट के अनुसार, भारत अमेरिका की सुरक्षा छतरी का विकल्प नहीं है और न ही चीन के विनिर्माण मॉडल की प्रतिकृति है. लेकिन वह एक तेजी से विखंडित हो रही वैश्विक अर्थव्यवस्था में “तीसरे ध्रुव” की भूमिका निभाने में सक्षम है. भारत की तेजी से बढ़ती विनिर्माण क्षमता, अपेक्षाकृत कम श्रम लागत, बेहतर होती कानूनी संरचना, तकनीकी कौशल और विशाल घरेलू बाजार उसे इस भूमिका के लिए उपयुक्त बनाते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप और कनाडा, अमेरिका की नीतिगत अनिश्चितता और चीन के साथ गहरे आर्थिक जुड़ाव की राजनीतिक कीमत से जूझ रहे हैं.

भारत के साथ रणनीतिक रिश्तों पर जोर

ऐसे हालात में यूरोप और कनाडा भारत के साथ व्यापार समझौतों तथा रक्षा-प्रौद्योगिकी सहयोग जैसे दीर्घकालिक रणनीतिक आर्थिक रिश्तों को प्राथमिकता दे रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत पर दबाव अपेक्षाकृत नरम रहा, खासकर जब इसकी तुलना यूरोप के प्रति अपनाए गए उनके कड़े रुख से की जाती है. वहीं अमेरिकी टैरिफ नीतियों और बढ़ती राजनीतिक दूरी के कारण फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और स्पेन के नेता हाल के समय में चीन की ओर रुख कर रहे हैं. कुछ बीजिंग का दौरा कर चुके हैं, तो कुछ वहां जाने की तैयारी में हैं. ताकि अपने उद्योगों के लिए बाजार तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित की जा सके.

यूरोप के सामने राजनीतिक और नैतिक दुविधा

हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक इन यूरोपीय देशों के नेताओं को घरेलू स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ सकता है. वे लंबे समय से चीन से “डी-रिस्किंग” की बात करते रहे हैं. जिसमें आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियां, राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएं और बीजिंग का मॉस्को के साथ सामरिक जुड़ाव शामिल है. रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय सरकारों पर मानवाधिकार संगठनों और मतदाताओं का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है. आलोचकों का आरोप है कि कई नेता आर्थिक और व्यावसायिक हितों को लोकतांत्रिक मूल्यों से ऊपर रख रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी नीतियां भविष्य में राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकती हैं और सरकारों को घरेलू स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ सकता है.

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