Petrol Diesel Price: पिछले 15 दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों ने पूरे दक्षिण एशिया में हलचल मचा दी है. कहीं तेल के दाम तेजी से बढ़े हैं तो कहीं सरकारों ने जनता को राहत देने के लिए कीमतों में कटौती भी की है. मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतों और डॉलर के मुकाबले कमजोर होती मुद्राओं का असर अब लगभग हर देश में दिखाई देने लगा है.
भारत में जहां लगातार बढ़ती कीमतों ने आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है, वहीं पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में भी ईंधन की कीमतों को लेकर अलग-अलग तस्वीर देखने को मिल रही है. हर देश ने अपनी आर्थिक स्थिति और सरकारी नीतियों के अनुसार अलग फैसला लिया है. ऐसे में आइए विस्तार से जानते हैं कि पिछले 15 दिनों में भारत और उसके पड़ोसी देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में क्या बदलाव हुए.
भारत में सबसे ज्यादा बढ़े दाम
भारत में पिछले 15 दिनों के दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 7 से 8 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक केवल 10 से 12 दिनों के भीतर ही चार बार तेल के दाम बढ़ाए गए हैं. राजधानी दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच चुका है, जबकि मुंबई और पटना जैसे शहरों में यह 110 रुपये के आसपास बिक रहा है. डीजल की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली है.
इस बढ़ोतरी का असर अब सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहा. ट्रांसपोर्ट महंगा होने से सब्जियां, राशन, दूध और दूसरी जरूरी चीजों की कीमतों पर भी असर पड़ने लगा है. रोजाना निजी वाहन इस्तेमाल करने वाले लोगों का फ्यूल बजट तेजी से बढ़ गया है.
पाकिस्तान में पहले बड़ा झटका, फिर मिली राहत
पाकिस्तान में हाल के दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिली थी. वहां ईंधन के दाम 320 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर के आसपास पहुंच गए थे, जिससे आम लोगों की मुश्किलें काफी बढ़ गई थीं. हालांकि बाद में सरकार ने घरेलू महंगाई और बढ़ते दबाव को देखते हुए कुछ राहत भी दी. शुरुआत में जहां तेज बढ़ोतरी हुई,
वहीं बाद में मामूली कटौती की गई. इसके बावजूद पाकिस्तान में तेल की कीमतें अभी भी काफी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं. वहां की कमजोर अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा संकट का असर ईंधन बाजार पर लगातार दिखाई दे रहा है.
बांग्लादेश में पहले से ही महंगा है तेल
बांग्लादेश में पिछले 15 दिनों के दौरान पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं देखा गया, लेकिन वहां तेल पहले से ही महंगा बना हुआ है. बांग्लादेश में ईंधन पर सीमित सब्सिडी दी जाती है, जिसकी वजह से कीमतें स्थिर रहने के बावजूद आम जनता पर बोझ बनी रहती हैं. वहां ट्रांसपोर्ट और दैनिक जरूरतों की लागत पहले से ही ज्यादा मानी जाती है.
नेपाल में आयात निर्भरता का असर
नेपाल में तेल की कीमतें काफी हद तक आयात पर निर्भर रहती हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर वहां भी दिखाई देता है. पिछले 15 दिनों में नेपाल में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इसका असर ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा के खर्चों पर पड़ा है. हालांकि सरकार कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है ताकि आम लोगों पर ज्यादा बोझ न पड़े.
श्रीलंका में धीरे-धीरे सुधर रही स्थिति
आर्थिक संकट से जूझ चुके श्रीलंका में अब तेल बाजार धीरे-धीरे स्थिर होता नजर आ रहा है. पिछले 15 दिनों में वहां कीमतों में बहुत बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है. IMF की मदद और सरकारी नियंत्रण के चलते वहां हालात पहले के मुकाबले कुछ बेहतर हुए हैं. हालांकि पेट्रोल-डीजल की कीमतें अभी भी सामान्य स्तर से ऊपर बनी हुई हैं और आम लोगों पर इसका असर जारी है.
चीन में सरकार रखती है पूरा नियंत्रण
चीन में तेल की कीमतों पर सरकार का काफी नियंत्रण रहता है. यही कारण है कि वहां अचानक बड़े उतार-चढ़ाव कम देखने को मिलते हैं. पिछले 15 दिनों में चीन में भी हल्का बदलाव जरूर दर्ज किया गया, लेकिन सरकार सब्सिडी और कंट्रोल सिस्टम के जरिए बाजार को स्थिर बनाए रखती है. वहां आम जनता पर अचानक महंगाई का बड़ा बोझ नहीं पड़ता.
भारत और पड़ोसी देशों में क्या है सबसे बड़ा फर्क?
अगर पूरे दक्षिण एशिया के हालात को देखें तो भारत में हालिया बढ़ोतरी सबसे ज्यादा तेज दिखाई देती है. इसके पीछे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, रुपये की कमजोरी, टैक्स स्ट्रक्चर और तेल कंपनियों की लागत एडजस्टमेंट जैसे कारण माने जा रहे हैं. वहीं पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में कभी राहत तो कभी अचानक बढ़ोतरी देखने को मिलती है, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था ज्यादा अस्थिर रहती है.
पिछले 15 दिनों का ट्रेंड साफ दिखाता है कि दक्षिण एशिया के लगभग सभी देश अब वैश्विक तेल बाजार पर काफी हद तक निर्भर हो चुके हैं. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला हर बदलाव सीधे आम लोगों की जेब और घरेलू बजट पर असर डाल रहा है.
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