West Bengal Voter List: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है और इसी बीच मंगलवार (7 अप्रैल) को चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े 60 लाख से अधिक मामलों का विस्तृत डेटा सार्वजनिक कर दिया है. आयोग की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अब तक कुल 90.66 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा चुके हैं,
जिसमें दिसंबर 2025 में जारी ड्राफ्ट लिस्ट के दौरान 58.2 लाख नाम हटाए गए थे, जबकि फरवरी 2026 में प्रकाशित अंतिम सूची तक 5.46 लाख अतिरिक्त नाम हटाए गए. इस बड़े आंकड़े ने चुनाव से ठीक पहले राज्य के राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है और विपक्षी दल इस पर लगातार सवाल उठा रहे हैं.
60 लाख मामलों की जांच, लाखों नाम जोड़े और हटाए गए
चुनाव आयोग के अनुसार डेटा में तकनीकी गड़बड़ियों यानी लॉजिकल विसंगतियों के आधार पर 60 लाख से ज्यादा मतदाताओं को जांच के दायरे में रखा गया था. इन मामलों को ‘अंडर एडजुडिकेशन’ की श्रेणी में रखा गया ताकि अधिकारियों द्वारा इनकी गहराई से जांच की जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि मतदाता सूची में केवल पात्र लोगों के नाम ही शामिल हों. आयोग ने बताया कि अब तक करीब 59.84 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जिसमें जांच के बाद 32.68 लाख पात्र लोगों के नाम दोबारा मतदाता सूची में जोड़े गए, जबकि 27.16 लाख लोगों को अपात्र पाते हुए उनके नाम हटा दिए गए. यह पूरी प्रक्रिया इस बात को दिखाती है कि बड़े स्तर पर मतदाता सूची की सफाई और सत्यापन का काम किया गया है.
पहली बार जिलेवार डेटा सार्वजनिक, पारदर्शिता पर जोर
इस पूरे मामले में एक और अहम पहलू यह है कि चुनाव आयोग के इतिहास में पहली बार पश्चिम बंगाल के लिए SIR से जुड़े नाम जोड़ने और हटाने का जिलेवार डेटा सार्वजनिक किया गया है. आयोग का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और मतदाता सूची की विश्वसनीयता को मजबूत करना है. अब यह डेटा आम लोगों के लिए भी उपलब्ध कराया गया है, जिससे कोई भी व्यक्ति इसकी जानकारी हासिल कर सकता है.
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप, हाईकोर्ट को भी निर्देश
इस बीच इस पूरे विवाद में सुप्रीम कोर्ट को भी हस्तक्षेप करना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट मंगलवार तक हर हाल में प्रकाशित की जाए और यह भी स्पष्ट किया था कि यदि सभी दस्तावेजों पर डिजिटल हस्ताक्षर नहीं हुए हों, तब भी सूची जारी की जाए ताकि प्रक्रिया में देरी न हो. इसके साथ ही कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट को तीन पूर्व जजों की एक कमेटी गठित करने के निर्देश दिए, जो इस पूरे मामले की निगरानी करेगी और सुनिश्चित करेगी कि प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से पूरी हो.
तय समय पर लिस्ट नहीं आई, बाद में डेटा जारी
हालांकि वोटर लिस्ट जारी करने की अंतिम तारीख सोमवार तय की गई थी, लेकिन काम पूरा न होने के कारण इसे समय पर जारी नहीं किया जा सका और इसके बाद मंगलवार को चुनाव आयोग ने यह डेटा सार्वजनिक किया. चुनाव से ठीक पहले इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटने और जोड़ने से राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और यह मुद्दा अब चुनावी बहस का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस पूरे विवाद का चुनावी नतीजों और वोटिंग पैटर्न पर कितना असर पड़ता है.
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