Bihar Diwas 2026: नालंदा की गौरव गाथा, जिसने पूरी दुनिया को दिया ज्ञान का प्रकाश

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Bihar Diwas 2026: आज बिहार का गौरव दिवस है. 22 मार्च 1912 को बिहार बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग होकर एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था. यह दिन सिर्फ एक ऐतिहासिक तारीख नहीं, बल्कि बिहार की समृद्ध विरासत, प्राचीन ज्ञान परंपरा और गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है. बिहार की पहचान केवल एक राज्य के रूप में नहीं, बल्कि उस भूमि के रूप में है जहां भगवान बुद्ध और महावीर ने ज्ञान दिया, आर्यभट्ट ने गणित को नई दिशा दी और नालंदा जैसे विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय ने पूरी दुनिया को शिक्षा का प्रकाश दिया.

नालंदा विश्वविद्यालय: दुनिया का सबसे प्राचीन ज्ञान केंद्र

बिहार की सबसे बड़ी पहचान नालंदा विश्वविद्यालय रहा है, जिसे विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय माना जाता है. पांचवीं शताब्दी में स्थापित यह महाविहार सिर्फ एक शिक्षा संस्थान नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सभ्यता का केंद्र था.

यहां हजारों छात्र और शिक्षक एक साथ रहते थे. ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, नालंदा में लगभग 10,000 छात्र और 2,000 शिक्षक मौजूद थे. इसका विशाल पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ तीन प्रमुख भवनों—रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक—में फैला हुआ था, जिसमें लाखों ग्रंथ सुरक्षित थे.

यहां पढ़ाए जाते थे ये विषय

नालंदा में शिक्षा का स्तर इतना व्यापक था कि यहां विभिन्न विषयों की पढ़ाई होती थी, जैसे:

  • बौद्ध दर्शन और तंत्र
  • वेद, व्याकरण और न्यायशास्त्र
  • गणित और खगोलशास्त्र
  • आयुर्वेद और चिकित्सा विज्ञान
  • भाषा, काव्य, कला और वास्तुकला

यही कारण था कि नालंदा उस समय वैश्विक ज्ञान का केंद्र बन गया था.

दुनिया भर में फैला ज्ञान का प्रकाश

नालंदा ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि चीन, तिब्बत, जापान, कोरिया और इंडोनेशिया तक ज्ञान का प्रसार किया. चीन के प्रसिद्ध यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग यहां अध्ययन करने आए थे और उन्होंने अपने लेखों में नालंदा की भव्यता का विस्तार से वर्णन किया है.

आक्रमण में जला ज्ञान का भंडार

इतिहास के एक दुखद अध्याय में 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय को जला दिया गया. कहा जाता है कि यहां का पुस्तकालय कई महीनों तक जलता रहा. हालांकि, इस विनाश के बावजूद बिहार की ज्ञान परंपरा कभी खत्म नहीं हुई.

फिर से जीवित हो रहा नालंदा

आज उसी नालंदा की विरासत को आगे बढ़ाते हुए नया नालंदा विश्वविद्यालय एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान के रूप में विकसित हो रहा है. यह भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा को आधुनिक दुनिया से जोड़ने का प्रयास है.

किताब के जरिए फिर जीवित हुई गौरव गाथा

लेखक अभय के. की पुस्तक “नालंदा: विश्व चेतना का उद्गम स्थल” इस महान विश्वविद्यालय के उत्थान, पतन और पुनर्जीवन की पूरी कहानी को सामने लाती है. पेंगुइन स्वदेश द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक नालंदा के इतिहास को सरल और रोचक तरीके से प्रस्तुत करती है. यह किताब उन सभी सवालों के जवाब देती है, जो सदियों से लोगों के मन में उठते रहे हैं—नालंदा की स्थापना कैसे हुई, वहां कौन पढ़ते थे, कितने छात्र-शिक्षक थे और इसका पतन क्यों हुआ.

बिहार की पहचान: सिर्फ भूमि नहीं, ज्ञान की जड़

बिहार दिवस के इस अवसर पर यह याद दिलाना जरूरी है कि बिहार केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता की जड़ है. नालंदा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. आज जब दुनिया आधुनिक विश्वविद्यालयों की बात करती है, तब नालंदा का इतिहास यह बताता है कि भारत की शिक्षा परंपरा कितनी समृद्ध और प्राचीन रही है.

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