Delhi Air Pollution: दिल्ली की जहरीली हवा को लेकर एक नई स्टडी ने चिंता बढ़ा दी है. राजधानी और NCR में प्रदूषण की चर्चा होते ही आमतौर पर वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन और पराली का धुआं सबसे पहले सामने आता है. लेकिन पुणे के भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के वैज्ञानिकों के अध्ययन में वायु प्रदूषण से जुड़ा एक अलग पहलू सामने आया है.
वैज्ञानिकों ने हवा में मौजूद प्रदूषक कणों की पड़ताल की
काफी समय तक जुटाए गए आंकड़ों और किए गए विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिकों ने दिल्ली की हवा में मौजूद प्रदूषक कणों की पड़ताल की. अध्ययन में ऐसे तत्वों की मौजूदगी और उनके स्वास्थ्य पर संभावित असर को लेकर महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदूषित हवा का प्रभाव केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं माना जा सकता, बल्कि कुछ प्रदूषक शरीर के हृदय और तंत्रिका तंत्र सहित अन्य महत्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित कर सकते हैं. आखिर इस अध्ययन में वैज्ञानिकों को क्या मिला और दिल्ली-NCR में रहने वाले लोगों के लिए इसके मायने क्या हैं? आइए, इस पूरी रिपोर्ट को आसान भाषा में समझते हैं.
वातावरण में पारे का स्तर सबसे अधिक दर्ज किया गया Delhi Air Pollution
करीब छह वर्षों तक दिल्ली के पर्यावरण और वायु गुणवत्ता पर किए गए अध्ययन के बाद पुणे के वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट जारी की है. इस रिसर्च में दिल्ली की हवा में मर्करी (पारा) की मौजूदगी को लेकर चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है. अध्ययन के अनुसार, देश के प्रमुख शहरों की तुलना में दिल्ली के वातावरण में पारे का स्तर सबसे अधिक दर्ज किया गया. रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली की हवा में मर्करी की सांद्रता करीब 7 नैनोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंची. वैज्ञानिकों के लिए यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैश्विक सामान्य बैकग्राउंड स्तर से चार गुना से भी ज्यादा बताया गया है.
अन्य बड़े शहरों के वायु नमूनों से की तुलना
शोधकर्ताओं ने दिल्ली के आंकड़ों की तुलना अहमदाबाद और पुणे जैसे अन्य बड़े शहरों के वायु नमूनों से भी की. इस तुलना में दिल्ली में मर्करी की मौजूदगी काफी अधिक पाई गई, जिससे राजधानी की वायु गुणवत्ता और उसमें मौजूद प्रदूषकों को लेकर चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट में दिल्ली-NCR की हवा में बढ़ते मर्करी के स्तर के पीछे कई स्रोतों की ओर इशारा किया गया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, आसपास के थर्मल पावर प्लांट और औद्योगिक इकाइयों में बड़े पैमाने पर होने वाला कोयले का इस्तेमाल पारे के उत्सर्जन का एक प्रमुख कारण है. इसके साथ ही फैक्ट्रियों से निकलने वाला रासायनिक धुआं और खुले में कचरा जलाने की गतिविधियां भी हवा में मर्करी की मात्रा बढ़ा सकती हैं.
सर्दियों के दौरान स्थिति और बिगड़ सकती है
राजधानी में लगातार बढ़ता वाहनों का आवागमन भी इस समस्या को और गंभीर बनाता है। बड़ी संख्या में वाहन रोजाना सड़कों पर चलते हैं, जिससे अलग-अलग तरह के प्रदूषक वातावरण में पहुंचते रहते हैं. सर्दियों के दौरान स्थिति और बिगड़ सकती है, क्योंकि कम तापमान और कमजोर हवा की वजह से प्रदूषक लंबे समय तक वातावरण में टिके रहते हैं और प्रदूषण की परत ज्यादा घनी नजर आती है.
स्वास्थ्य पर संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई गई
पुणे के शोधकर्ताओं के अध्ययन में हवा में मौजूद मर्करी के स्वास्थ्य पर संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई गई है. लंबे समय तक पारे के संपर्क में रहना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है और इसका प्रभाव खास तौर पर दिमाग तथा तंत्रिका तंत्र पर पड़ सकता है. पारे के लगातार संपर्क से न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. इसके अलावा, लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से शरीर के दूसरे अंगों और प्रतिरक्षा तंत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है. ऐसे में दिल्ली-NCR की हवा में मर्करी की मौजूदगी को लेकर सामने आए आंकड़े स्वास्थ्य के लिहाज से चिंता का विषय बन गए हैं.

