Kolkata Stampede: कोलकाता में दुर्गा पूजा की सप्तमी की शाम चोरबागान सार्वजनिन दुर्गा पंडाल में उत्सव का माहौल अचानक चीख-पुकार में बदल गया. बारिश से बचने के लिए पंडाल में उमड़ी भीड़ के बीच अफरा-तफरी मच गई. देखते ही देखते हालात इतने बिगड़ गए कि 20 लोगों की जान चली गई, जबकि 35 लोग घायल हो गए. इस हादसे ने पूजा पंडालों में सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.
शाम 7:40 बजे शुरू हुई बारिश, फिर बिगड़ते चले गए हालात
सप्तमी की शाम करीब 7:40 बजे बारिश शुरू हुई. मौसम विभाग पहले ही बारिश की संभावना जता चुका था, लेकिन इसके बावजूद कोलकाता के प्रमुख पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मौजूद थी. चोरबागान सार्वजनिन में भी पिछले कई दिनों से बड़ी संख्या में लोग दर्शन के लिए पहुंच रहे थे. बारिश शुरू होते ही लोग भीगने से बचने के लिए पंडाल के अंदर जाने लगे। आयोजकों के मुताबिक, एक साथ बड़ी संख्या में लोगों के प्रवेश करने से दबाव बढ़ गया.
इसी दौरान पंडाल का (Kolkata Stampede) एक हिस्सा गिर गया, जिससे स्थिति और बिगड़ गई. बारिश के कारण रोशनी कम थी और कुछ हिस्सों में ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था. आने-जाने के लिए सीमित और संकरा रास्ता होने से लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई. भीड़ के दबाव, कम दृश्यता और रास्ते की कमी के बीच अफरा-तफरी फैल गई. लोग बचने के लिए भागने लगे और इस दौरान कई लोग जमीन पर गिर पड़े. उनके ऊपर दूसरे लोगों के गिरने से कुचलने की घटनाएं हुईं.
मां को आंखों के सामने खोने का दर्द Kolkata Stampede
इस हादसे की भयावहता का (Kolkata Stampede) अंदाजा 25 वर्षीय सोनू पाल की आपबीती से लगाया जा सकता है. वह सप्तमी की शाम अपनी मां के साथ चोरबागान पंडाल में दर्शन करने पहुंचा था. उसे अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही देर में यह शाम उसकी जिंदगी की सबसे दर्दनाक याद बन जाएगी. सोनू के मुताबिक, बाहर बारिश हो रही थी और लोग पंडाल से निकलने के बजाय अंदर रहना चाहते थे. इसी बीच प्रवेश द्वार पर मौजूद लोगों ने बारिश से बचने के लिए अंदर जाने की कोशिश की.
भीड़ बढ़ती गई और धक्का-मुक्की शुरू हो गई. उसने बताया कि दबाव बढ़ने पर पंडाल के अंदर मौजूद लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगे. सोनू ने किसी तरह खुद को संभाला और अपनी मां को तलाशने पहुंचा, लेकिन वह वहां नहीं मिलीं. उसने अपनी आंखों के सामने अपनी मां को भीड़ में कुचलते देखा. इस घटना के बाद से वह सदमे में है. सोनू ने बताया कि हालात इतने भयावह थे कि उसे खुद भी अपनी जान बचने की उम्मीद नहीं लग रही थी.
वॉलंटियर और पुलिस की व्यवस्था पर उठे सवाल
हादसे के बाद स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों ने भीड़ प्रबंधन को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए. उनका कहना था कि पंडाल में प्रवेश और निकास के लिए स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी. अनाउंसमेंट की कमी के कारण श्रद्धालुओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हुई, जिससे अव्यवस्था और बढ़ गई. कुछ स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि मौके पर पर्याप्त पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थे और पुलिस की तैनाती मुख्य रूप से वीआईपी प्रवेश द्वार के आसपास थी. उन्होंने घायलों को अस्पताल पहुंचाने में प्रशासनिक सहायता मिलने में देरी होने की भी शिकायत की.
क्या पर्याप्त इंतजाम किए गए थे?
इन आरोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पंडाल में भारी भीड़ जुटने की आशंका थी और बारिश का पूर्वानुमान भी मौजूद था, तो प्रवेश-निकास और आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए क्या पर्याप्त इंतजाम किए गए थे? भीड़ को नियंत्रित करने के लिए तैनात वॉलंटियर और सुरक्षाकर्मी हालात बिगड़ने पर कितने प्रभावी ढंग से काम कर पाए, यह भी जांच का विषय है. हालांकि, स्थानीय लोगों के आरोपों और आयोजकों के बयानों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. हादसे की जिम्मेदारी तय करने के लिए सुरक्षा व्यवस्था, उपलब्ध निकास मार्गों और आपातकालीन प्रतिक्रिया की जांच महत्वपूर्ण होगी.
घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया, मौके पर पहुंचीं बचाव टीमें
भगदड़ के बाद घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई. घायलों को निकालकर कोलकाता मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (MCH) पहुंचाया गया. स्थिति को संभालने के लिए लालबाजार कंट्रोल रूम से अतिरिक्त पुलिस बल भेजा गया. फायर ब्रिगेड, कोलकाता पुलिस की डिजास्टर मैनेजमेंट टीम और मेडिकल स्टाफ को भी राहत एवं बचाव कार्य में लगाया गया. एम्बुलेंस की मदद से घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पंडाल का एक हिस्सा गिरने की खबर फैलते ही लोग घबरा गए और अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे.
भीड़ में संतुलन बिगड़ने के कारण लोग गिरते चले गए और कई लोग उनके नीचे दब गए. स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि शुरुआती समय में बचाव के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए और मौके पर मौजूद लोगों को ही घायलों की मदद करनी पड़ी. इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है.
आखिर कौन था इस हादसे के लिए जिम्मेदार?
चोरबागान की घटना ने एक बार फिर बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन की अहमियत सामने ला दी है. बारिश जैसी अनुमानित परिस्थिति में श्रद्धालुओं की आवाजाही नियंत्रित करने, प्रवेश और निकास के रास्ते खुले रखने, पर्याप्त रोशनी सुनिश्चित करने और आपात स्थिति में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था बेहद जरूरी होती है. इस हादसे में 20 लोगों की मौत और 35 लोगों के घायल होने की खबर ने कई परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया.
अब सवाल यह है कि क्या भीड़ के संभावित दबाव का सही आकलन किया गया था, क्या सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन हुआ और क्या आपातकालीन प्रतिक्रिया समय पर शुरू हुई. इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे. फिलहाल, चोरबागान की यह त्रासदी याद दिलाती है कि किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन में श्रद्धालुओं की सुरक्षा केवल इंतजामों का हिस्सा नहीं, बल्कि सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए.

