मां भगवती ही हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश की जननी: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
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Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, मां सिद्धिदात्री देवी दुर्गा का नवां स्वरूप है। जिनकी पूजा नवरात्रि के नवमी को की जाती है। सिद्धि का अर्थ अलौकिक शक्ति या पूर्णता, दात्री का अर्थ है देने वाली।मां अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं। मां का उपासक भक्त जो कोई कार्य करता है। उसके सारे कार्य पूर्ण होते हैं। मां का आसन कमल और वाहन सिंह है। भगवान शिव ने भी सभी सिद्धियों को प्राप्त करने के लिये भगवती सिद्धिदात्री की आराधना की थी।
सर्वोपरि तत्त्व माँ भगवती! श्रीब्रह्माजी ने देवी भागवत में नारद जी को माध्यम बनाकर बताया कि- भगवती ही सर्वोपरि तत्त्व हैं, उनसे ही हम सब पैदा हुए हैं। हमारी भी कोई माँ तो होगी? बिना माँ के पुत्र कैसे आयेगा? ब्रह्मा, विष्णु और महेश पुत्र हैं, इनकी भी कोई माँ होगी? वह भुवनेश्वरी भगवती त्रिपुरसुन्दरी दुर्गा ही उनकी मां है।इसलिए आरती में गाया जाता है –
तुमको निशिदिन ध्यावत हरि, ब्रह्मा, शिव जी। ब्रह्मा, विष्णु और शिवाजी भगवती का निरन्तर ध्यान करते हैं। एक सिंहासन बनाया गया था, जो बड़ा भव्य और दिव्य था। उस सिंहासन के चार पाए थे। वह पाए लकड़ी या सोने चांदी के नहीं थे। ब्रह्मा ही एक पाया बनाकर बैठ गये, विष्णु दूसरा पाया, रूद्र तीसरा पाया और ईश्वर चौथा पाया बन गये। उस पर सदाशिव लेट गये, उन का बिस्तर बन गया।अब इस सिंहासन पर जो बैठ जाये, वह सबसे बड़ा होगा।
अब इस पर कौन-सा देवता बैठेगा? कोई नहीं आया। देवी भागवत में लिखा है कि- उस समय पारम्बा भगवती महामाया त्रिपुर सुन्दरी दिव्य रूप धारण करके प्रकट हुईं और आकर सिंहासन पर विराजमान हो गईं।अर्थात् भगवती के सिंहासन के पाये ब्रह्मा, विष्णु, और शंकर है।पराम्बा भगवती त्रिपुर सुन्दरी जब सिंहासन पर बैठी हैं,तब लक्ष्मी और सरस्वती उन्हें पंखा झलती रहती हैं।
मां सरस्वती सर्वोपरि तत्व है। इसीलिए कृष्ण से पहले राधा का स्मरण,राम से पहले सीता का स्मरण और नारायण से पहले लक्ष्मी का स्मरण होता है। जो बड़ा है, उसका स्मरण पहले होता है।जैसे- सीता-राम,राधे-श्याम, लक्ष्मी-नारायण, गौरी-शंकर। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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