New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान से भारत आए अनुसूचित जाति के हिंदुओं की दुर्दशा पर सवाल उठाया है. कोर्ट ने कहा है कि जब सरकार ने इन लोगों को नागरिकता दी तो उन्हें गरिमापूर्ण तरीके से रहने की जगह भी उपलब्ध करानी चाहिए. इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के DDA को नोटिस जारी कर चार हफ्तों के अंदर जवाब मांगा है.
विस्थापित करने की किसी भी योजना पर रोक
कोर्ट ने फिलहाल इन लोगों को विस्थापित करने की किसी भी योजना पर रोक लगा दी है. सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रहने वाले इन शरणार्थियों के विस्थापन के खतरे के बीच आई है, जहां सिग्नेचर ब्रिज के पास उनका कैंप है. ये लोग पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न से बचकर भारत आए थे. ज्यादातर अनुसूचित जाति के हिंदू हैं और यहां झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं.
प्रक्रिया में कुछ के आवेदन
कइयों को नागरिकता मिल चुकी है जबकि कुछ के आवेदन प्रक्रिया में हैं. दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) और अन्य एजेंसियां यमुना फ्लडप्लेन पर अवैध कब्जे के नाम पर उन्हें हटाने की तैयारी कर रही थीं. दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2025 में एक फैसले में हटाने का रास्ता साफ किया था. जिसके खिलाफ ये लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे.
केंद्र सरकार और DDA को नोटिस
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने केंद्र सरकार और DDA को नोटिस जारी किया और चार हफ्तों के अंदर जवाब मांग लिया. साथ ही कोर्ट ने फिलहाल इन लोगों को विस्थापित करने की किसी भी योजना पर रोक लगा दी है. पीठ ने स्पष्ट कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार में सिर्फ नागरिकता काफी नहीं है बल्कि आश्रय और सम्मानजनक जीवन भी शामिल है.
वैकल्पिक आवास या पुनर्वास क्यों नहीं
कोर्ट ने सरकार से पूछा कि नागरिकता देने के बाद इन्हें वैकल्पिक आवास या पुनर्वास क्यों नहीं दिया जा रहा. यहां करीब 250-260 परिवार (लगभग 800-1200 लोग) रहते हैं. ज्यादातर मजदूरी, घरेलू काम या छोटे-मोटे काम करके गुजारा करते हैं. उनका कहना है कि पाकिस्तान में उन्हें काफिर कहा जाता था. भारत आने पर शुरुआत में संदेह झेलना पड़ा. लेकिन अब नागरिकता मिलने के बाद भी बेघर होने का डर सता रहा है.
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