Rakshabandhan: ‘जंगल ही हमारे माता-पिता और भाई’, आदिवासी महिलाओं ने पेड़ को बांधी राखी

Ved Prakash Sharma
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Jharkhand News: भाई-बहन के अटूट बंधन के पर्व रक्षा बंधन के अवसर पर झारखंड में आदिवासी महिलाओं ने गुरुवार को पेड़ों पर राखियां बांधीं. झारखंड के 700 गांवों में हजारों ग्रामीण लोगों और प्रकृति के बीच भावनात्मक जुड़ाव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुक्रवार को रक्षाबंधन के मौके पर करीब एक लाख पेड़ों को राखी बांधी जाएगी.

यह पहल ‘पेड़ बचाओ’ अभियान का हिस्सा है, जो एक महीने तक चलेगा. इस अभियान के तहत 24 जिलों के चिन्हित गांवों में तीन लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य रखा गया है. कुमार शुक्रवार को गुमला जिले के जोराड़ गांव में एक पेड़ को राखी बांधकर इस अभियान की शुरुआत करेंगे.

क्या कहा राखी बांधने वाली महिलाओं ने?

स्थानीय आदिवासी महिला रेशमा मर्डी ने कहा, “हमने अपने पूर्वजों से सीखा है और वे हमेशा जंगलों की रक्षा करते हैं. जंगल हमारे माता-पिता के समान हैं. हम पेड़ों को राखी बांधते हैं. हम आने वाली पीढ़ियों को भी यही संदेश देना चाहते हैं.”

पद्म श्री जमुना टुडू ने कहा, “आज रक्षा बंधन के शुभ अवसर पर हमने वृक्षों को राखियां बांधी हैं. आज हमने वृक्षों की दीर्घायु के लिए उन्हें राखियां बांधी हैं. यह पूरा वन है. हमने प्रतिज्ञा ली है कि आखिरी सांस तक हम पेड़ों को कटने नहीं देंगे.”

वहीं उन्होंने बताया कि हमने पेड़ों को भाई मानकर राखियां बांधी हैं. पेड़ों के साथ-साथ जंगल में जितने भी जानवर हैं, उनकी सुरक्षा करना भी हमारा ही दायित्व है. आजकल जंगल से हाथी निकलकर आ रहे हैं. उसका असल कारण पेड़ों की कटाई है. इसलिए हम सभी महिलाओं ने संकल्प लिया है कि जितनी भी हमारे अंदर जान रहेगी, उतने दिन हम जंगल को कटने नहीं देंगे. जंगल को बचाने का काम करते रहेंगे.

अभियान पर पीसीसीएफ ने क्या बताया?

पीसीसीएफ ने कहा, “हमने शुक्रवार को रक्षाबंधन के दिन 700 गांवों में करीब एक लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य रखा है. यह अभियान एक महीने तक जारी रहेगा और इस दौरान 24 जिलों में करीब तीन लाख पेड़ों को राखी बांधी जाएगी.”

कुमार की इस पहल की शुरुआत वर्ष 2004 में धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड के लुकैया गांव से हुई थी जो कभी माओवाद प्रभावित रहा था. उन्होंने बताया कि तब से अब तक राज्यभर में 12,000 से अधिक गांवों को इस कार्यक्रम से जोड़ा जा चुका है. उन्होंने कहा, “इस पहल के माध्यम से लुकैया गांव में 20,000 से अधिक महुआ के पेड़ों को संरक्षित किया गया.

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