New Delhi: केंद्र सरकार राजधानी दिल्ली में स्थित सात पुरानी सरकारी हाउसिंग कॉलोनियों के बड़े पुनर्विकास प्रोजेक्ट पर काम कर रही है. इस योजना के तहत इन कॉलोनियों को आधुनिक आवासीय परिसरों में बदला जाएगा. खास बात यह है कि इस परियोजना को सेल्फ-फाइनेंसिंग मॉडल के जरिए पूरा किया जा रहा है, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा.

इस प्रोजेक्ट में सरोजिनी नगर, नेताजी नगर, नौरोजी नगर, कस्तूरबा नगर, त्यागराज नगर, श्रीनिवासपुरी और मोहम्मदपुर जैसी कॉलोनियां शामिल हैं. ये सभी कॉलोनियां मिलाकर करीब 537 एकड़ क्षेत्र में फैली हुई हैं.
कई पुराने क्वार्टर हो चुके थे जर्जर
इन कॉलोनियों में बने अधिकांश सरकारी क्वार्टर काफी पुराने हो चुके हैं और कई इमारतें संरचनात्मक रूप से कमजोर भी हो गई हैं. रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 40 प्रतिशत आवास अब रहने योग्य नहीं बचे थे.
इसके अलावा केंद्र सरकार को अपने कर्मचारियों के लिए 20,000 से अधिक घरों की कमी का सामना करना पड़ रहा था. इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए इन कॉलोनियों के पुनर्विकास का फैसला लिया गया.
बनेंगे आधुनिक ऊंचे आवासीय कॉम्प्लेक्स
रीडेवलपमेंट योजना के तहत पुरानी कम ऊंचाई वाली इमारतों की जगह आधुनिक और बहुमंजिला रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स तैयार किए जाएंगे. इससे न केवल आवासीय क्षमता बढ़ेगी बल्कि बेहतर बुनियादी ढांचा और सार्वजनिक सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी.
इस परियोजना के तहत 21,000 से अधिक नए फ्लैट बनाए जाने की योजना है, जिससे सरकारी कर्मचारियों को बेहतर आवास सुविधाएं मिल सकेंगी.
पीएम मोदी करेंगे फ्लैट्स का उद्घाटन और शिलान्यास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 मार्च को इस परियोजना से जुड़े नए आवासों का उद्घाटन और शिलान्यास करेंगे.
इस दौरान
- 2,722 नए फ्लैट्स का उद्घाटन किया जाएगा
- 6,632 फ्लैट्स का शिलान्यास किया जाएगा
ये फ्लैट सरोजिनी नगर, नेताजी नगर, कस्तूरबा नगर और श्रीनिवासपुरी में जनरल पूल रेजिडेंशियल अकोमोडेशन (GPRA) रीडेवलपमेंट योजना के तहत बनाए गए हैं.
सेल्फ-सस्टेनिंग मॉडल से होगा पूरा प्रोजेक्ट
इस परियोजना की सबसे खास बात इसका सेल्फ-सस्टेनिंग फाइनेंशियल मॉडल है. इसमें टैक्सपेयर्स के पैसे का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.
सरकार ने परियोजना क्षेत्र के लगभग 69.41 एकड़ जमीन, यानी कुल क्षेत्र के करीब 12.9 प्रतिशत हिस्से, को कमर्शियल और रेजिडेंशियल उपयोग के लिए विकसित कर उसे मोनेटाइज करने की योजना बनाई है.
सरकारी बजट पर नहीं पड़ेगा बोझ
इस सीमित भूमि मोनेटाइजेशन से सरकार को 35,100 करोड़ रुपये से अधिक राजस्व मिलने का अनुमान है, जबकि पूरे प्रोजेक्ट की लागत लगभग 32,800 करोड़ रुपये आंकी गई है.
इसका मतलब है कि यह पूरा प्रोजेक्ट सरकारी बजट पर अतिरिक्त भार डाले बिना पूरा किया जा सकेगा. साथ ही इससे सरकार को करीब 2,300 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व (सरप्लस) भी मिलने की संभावना है.