सुप्रीम कोर्ट का फैसला, लखनऊ में गिराने ही होंगे वकीलों के 72 अवैध चैंबर, हाईकोर्ट के आदेश में दखल से इनकार

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New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ में जिला एवं सत्र न्यायालय के पास बने वकीलों के करीब 72 अवैध चैंबर को लेकर सख्त रुख अपनाया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के इन निर्माणों को गिराने के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि कोर्ट परिसर में किसी भी तरह के अवैध निर्माण और अतिक्रमण को जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती. साफ किया कि कोर्ट परिसर में अतिक्रमण और अनधिकृत निर्माण को किसी पद, संगठनात्मक जिम्मेदारी या अन्य आधार पर जारी नहीं रखा जा सकता.

अवैध कब्जे को लेकर कड़ी नाराजगी

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान अवैध कब्जे को लेकर कड़ी नाराजगी जताई. जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि मुख्य सड़क पर कब्जा किया गया और कोर्ट परिसर के भीतर खाली जगह पर भी कब्जा कर अवैध निर्माण खड़ा कर दिया गया. इसके बाद यह तर्क दिया जा रहा है कि एसोसिएशन के अध्यक्ष या गवर्निंग बॉडी के सदस्य होने के कारण संबंधित लोगों को वहां बने रहने का अधिकार है. जस्टिस नाथ ने स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं हो सकता.

सभी अवैध निर्माण गिराने होंगे

जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि सभी अवैध निर्माण गिराने होंगे. उन्होंने कहा कि वह खुद करीब दो साल तक वरिष्ठ जज के तौर पर वहां रहे हैं और उन्हें पता है कि किस तरह के निर्माण किए गए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि इन निर्माणों की वजह से सड़कें बाधित होती हैं और ट्रैफिक की स्थिति प्रभावित होती है. सुनवाई के दौरान सीनियर लॉयर आदिश अग्रवाल ने वकीलों के लिए वैकल्पिक जगह उपलब्ध कराने का सुझाव दिया.

सोसायटी के लिए जमीन उपलब्ध कराने का अनुरोध

इस पर जस्टिस नाथ ने कहा कि वकील जमीन खरीद सकते हैं और राज्य सरकार से अपनी सोसायटी के लिए जमीन उपलब्ध कराने का अनुरोध कर सकते हैं. याचिकाकर्ता की ओर से मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का अनुरोध भी किया गया. इस पर जस्टिस नाथ ने सवाल किया कि वकीलों के साथ मध्यस्थता क्यों की जाए. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी.

सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ अवैध निर्माण पर ही नहीं, बल्कि कोर्ट परिसर की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए. जस्टिस संदीप मेहता ने पूछा कि अगर कोर्ट परिसर में इस तरह अतिक्रमण होगा तो अदालत की सीमाओं और पूरे परिसर की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा. जस्टिस मेहता ने कहा कि वकीलों को इस तरह अतिक्रमण करने में कोई झिझक नहीं होती.

शांतिपूर्वक अवैध चैंबर खाली करने की सलाह

उन्होंने राजस्थान की एक जिला अदालत का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां दौरे के दौरान उन्होंने देखा था कि जिला जजों के लिए निर्धारित पार्किंग की जगह को एक वकील ने अपने चैंबर में बदल दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को शांतिपूर्वक अवैध चैंबर खाली करने की सलाह दी. पीठ ने साफ किया कि कोर्ट परिसर में अतिक्रमण और अनधिकृत निर्माण को किसी पद, संगठनात्मक जिम्मेदारी या अन्य आधार पर जारी नहीं रखा जा सकता.

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