New Delhi: कश्मीर और लद्दाख के बीच देश की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में शामिल जोजिला टनल 9 जून को एक बड़े माइलस्टोन तक पहुंचने जा रही है. इसे केवल एक इंजीनियरिंग उपलब्धि नहीं, बल्कि देश की कनेक्टिविटी और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने वाले अहम कदम के रूप में देखा जा रहा है. जोजिला टनल को लद्दाख की नई लाइफलाइन माना जा रहा है. इसके पूरा होने से न केवल सालभर सड़क संपर्क बना रहेगा, बल्कि पर्यटन, व्यापार और क्षेत्रीय विकास को भी नई गति मिलेगी.
एक ऐतिहासिक कदम
9 जून का ब्रेकथ्रू इसी दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है. केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी इस दिन सुरंग के ब्रेकथ्रू कार्यक्रम में शामिल होंगे. करीब 13.15 किलोमीटर लंबी यह सुरंग समुद्र तल से लगभग 11,500 फीट की ऊंचाई पर बन रही है. ब्रेकथ्रू ब्लास्ट सुरंग निर्माण के सबसे कठिन चरण के पूरा होने का संकेत माना जाता है. परियोजना पूरी होने के बाद यह कश्मीर घाटी को कारगिल और लद्दाख से सालभर जोड़े रखेगी. साथ ही यह दुनिया की सबसे लंबी सिंगल-ट्यूब दोतरफा सड़क सुरंगों में शामिल होगी.
हर साल कई महीनों तक बंद
फिलहाल भारी बर्फबारी के कारण जोजिला दर्रा हर साल कई महीनों तक बंद रहता है, जिससे लद्दाख का सड़क संपर्क प्रभावित होता है. सुरंग बनने के बाद इस समस्या से काफी हद तक राहत मिलेगी. स्थानीय लोगों, पर्यटकों, व्यापारियों और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति से जुड़े लोगों को इसका सीधा लाभ मिलेगा. यात्रा का समय घटेगा और क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा.
जोजिला टनल एक बेहद चुनौतीपूर्ण परियोजना
ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट अभिजीत सिन्हा ने कहा कि बर्फबारी के दौरान रास्ता बंद होने से सैन्य, लॉजिस्टिक और उपकरणों की आवाजाही में बड़ी दिक्कतें आती हैं. उन्होंने कहा कि जोजिला टनल एक बेहद चुनौतीपूर्ण परियोजना रही है और इसके पूरा होने के बाद आम लोगों के साथ-साथ सेना की भी पूरे साल निर्बाध कनेक्टिविटी बनी रहेगी. स्थानीय लोगों में भी इस परियोजना को लेकर उत्साह है.
लद्दाख तक सेना और सुरक्षा बलों की तेज आवाजाही
अभिजीत सिंहा के मुताबिक जोजिला टनल का सबसे बड़ा महत्व इसके सामरिक पहलू से जुड़ा है. चीन और पाकिस्तान की सीमाओं के करीब स्थित लद्दाख तक सेना और सुरक्षा बलों की तेज आवाजाही के लिए यह परियोजना बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है. सुरंग बनने के बाद सैनिकों, हथियारों, ईंधन और अन्य जरूरी सैन्य सामग्री की आपूर्ति हर मौसम में संभव हो सकेगी. इससे सीमावर्ती इलाकों में तैनात जवानों तक संसाधन तेजी से पहुंचेंगे और सेना की परिचालन क्षमता भी मजबूत होगी.
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