Antarctic Sea Ice At Record Low: अंटार्कटिका की सर्दियों में बनने वाली समुद्री बर्फ इस साल रिकॉर्ड स्तर पर बनी थी, लेकिन इस समय सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. यानी बर्फ बहुत तेजी से पिघल रही है. बता दें कि 14 सितंबर को यहां समुद्री बर्फ का विस्तार करीब 1.759 करोड़ वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया. यदि आगे भी यही आंकड़ा रहा तो उपग्रह से आंकड़े रिकॉर्ड करने की शुरुआत के बाद यह तीसरा सबसे कम अंटार्कटिक समुद्री बर्फ होगा. यह औसत से करीब 10 लाख वर्ग किलोमीटर कम है.
अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ सबसे निचले स्तर पर, क्या खत्म हो जाएगा यूरोप? वैज्ञानिकों ने जताई चिंता
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इस दौरान सबसे चिंता वाली बात केवल इस साल का आंकड़ा नहीं है. बल्कि बीते चार साल में अंटार्कटिका में सर्दियों के दौरान समुद्री बर्फ का विस्तार भी काफी कम रहा है. अर्थात यह अब केवल एक साल की असामान्य घटना नहीं दिख रही. वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह अंटार्कटिका के समुद्री बर्फ के पैटर्न में बदलाव का संकेत है.
दरअसल, अंटार्कटिका के आसपास समुद्र का पानी सर्दियों में जमकर बर्फ की एक बड़ी परत बना देता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा गर्मियों में पिघल जाता है. इसलिए अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ हर साल बहुत तेजी से बढ़ती और घटती है. हालांकि समुद्र में तैर रही बर्फ के पिघलने से सीधे समुद्र का जलस्तर नहीं बढ़ता. क्योकि यह बर्फ पहले से ही समुद्र के पानी पर तैर रही होती है. असली खतरा तब बढ़ता है, जब समुद्री बर्फ में कमी से अंटार्कटिका की जमीन पर मौजूद विशाल बर्फ की चादर और ग्लेशियरों पर असर पड़ता है.
बता दें कि समुद्री बर्फ सूरज की रोशनी का बड़ा हिस्सा वापस अंतरिक्ष में भेजती है. जब बर्फ का क्षेत्र घटता है तो समुद्र का ज्यादा खुला पानी सूरज की गर्मी सोखता है. इससे दक्षिणी महासागर ज्यादा गर्मी अपने भीतर ले सकता है. वहीं, गर्म पानी फिर बर्फ के दूसरे हिस्सों पर दबाव बढ़ा सकता है. यही वह चक्र है जिसे वैज्ञानिक गंभीरता से देख रहे हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2026 में अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ पूरे बढ़ने वाले मौसम में लंबे समय के औसत से नीचे रही. हालांकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि समुद्री बर्फ में साल-दर-साल प्राकृतिक उतार-चढ़ाव काफी ज्यादा होता है. इसलिए किसी एक साल के आंकड़े से पूरी जलवायु व्यवस्था का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा.
हालांकि अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ के कम होने का मतलब यह नहीं है कि यूरोप खत्म होने वाला है. दरअसल, समुद्री बर्फ के पिघलने से समुद्र का जलस्तर सीधे नहीं बढ़ता. लेकिन अंटार्कटिका की जमीन पर मौजूद विशाल बर्फ की चादर अगर लंबे समय में तेजी से कमजोर होती है और जमीन की बर्फ समुद्र में पहुंचती है, तो वैश्विक समुद्र स्तर बढ़ सकता है. जिसका असर दुनिया भर के तटीय इलाकों पर पड़ेगा. वहीं, यूरोप भी इससे अछूता नहीं रहेगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि निकट भविष्य में पूरा यूरोप समुद्र में डूब जाएगा.
दरअसल, समुद्री बर्फ में लगातार कमी यह संकेत दे रही है कि अंटार्कटिका की जलवायु व्यवस्था बदल रही है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, पिछले एक दशक के अधिकांश समय में अंटार्कटिका का समुद्री बर्फ विस्तार कई मौसमों में औसत से नीचे रहा है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह बदलाव कितनी तेजी से हो रहा है और इसका असर अंटार्कटिका की जमीन पर मौजूद बर्फ, समुद्र के तापमान और वैश्विक जलवायु पर आगे कितना पड़ेगा.
इसके अलावा, वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि अंटार्कटिका की बर्फीली व्यवस्था में बदलाव सिर्फ ध्रुव तक सीमित नहीं रहता. इसका असर समुद्र, मौसम, समुद्री जीवों और अंततः दुनिया के तटीय इलाकों तक पहुंच सकता है. यानी अंटार्कटिका की बर्फ अभी खत्म नहीं हो रही, लेकिन उसके बदलते व्यवहार को नजरअंदाज करना भी खतरे से खाली नहीं है.

