अंतरिक्ष में क्यों खराब हो जाता हैं इंसानों का पेट, क्या है बैक्टीरिया और गुरुत्वाकर्षण का कनेक्शन?

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Astronauts in Space: अंतरिक्ष में रहना जितना रोमांचक होता है उतना ही चुनौतीपूर्ण भी होता है. स्पेस में अंतरिक्ष यात्रियों के बीच कब्ज होना यानी कॉन्सटिपेशन एक बेहद आम समस्या है, लेकिन ऐसा क्यों होता है? ये सवाल लंबे समय से उठ रहा है. वही, अब यूनिवर्सिटी ऑफ कॉपेनहेगन और नासा के वैज्ञानिकों ने मिलकर इस गुत्थी को सुलझा लिया है, जिसकी वजह गुरुत्वाकर्षण का नही होना हैं.

52 अंतरिक्ष यात्रियों के ब्लड सैंपल पर रिसर्च

दरअसल, रिसर्चर्स ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर कई महीने बिताने वाले 52 अंतरिक्ष यात्रियों के ब्लड सैम्पल की बारीकी से जांच की. जिसमें पेट के अंदर उन गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल बदलावों की पहचान की गई, जो अंतरिक्ष यात्री धरती छोड़कर गुरुत्वाकर्षण से दूर जाने के तुरंत बाद अनुभव करते हैं.
इस दौरान न्यूट्रिशन, एक्सरसाइज एंड स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट की एसोसिएट प्रोफेसर और इस स्टडी में शामिल जियोर्जिया ला बार्बेरा ने बताया कि अंतरिक्ष यात्रियों के खून के नमूनों में ऐसे बदलाव दिखे हैं जो यह बताते हैं कि स्पेस में पहुंचते ही वहां के गट बैक्टीरिया यानी पेट के अच्छे बैक्टीरिया सामान्य से कहीं ज्यादा प्रोटीन फर्मेंटेशन करने लगते हैं. यह बदलाव तब तक जारी रहता है, जब तक वे वापस धरती पर नहीं लौट आते हैं.

फाइबर खत्म होने पर शुरू होता है प्रोटीन फर्मेंटेशन 

रिसर्च के मुताबिक, जब शरीर में फाइबर की मात्रा खत्म हो जाती है, तो गट बैक्टीरिया फाइबर की जगह प्रोटीन को तोड़ना शुरू कर देते हैं, जिसे प्रोटीन फर्मेंटेशन कहा जाता है. हालांकि यह कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है यह धरती पर भी कई लोगों के साथ होता है. ऐसे में इस स्टडी में शामिल एसोसिएट प्रोफेसर हेनरिक रोजर ने बताया कि अंतरिक्ष में ग्रेविटी की कमी के कारण भोजन आंतों में बहुत धीमी गति से आगे बढ़ता है. यह बात इस तथ्य से मेल खाती है कि हमें बढ़े हुए प्रोटीन फर्मेंटेशन के संकेत मिल रहे हैं. यही वजह अंतरिक्ष यात्रियों में कब्ज की समस्या की एक बड़ी वजह हो सकती है.

पेट और दिमाग का गहरा कनेक्शन 

बता दें कि यह रिसर्च अंतरिक्ष यात्रियों के ब्लड मेटाबोलाइट्स का एनालिसिस करने के लिए की गई थी. दर्मेसल, टाबोलाइट्स शरीर में मौजूद वे छोटे मॉलिक्यूल्स होते हैं जो यह बताते हैं कि हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म कैसे काम कर रहा है. इनकी मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि इंसान ने क्या खाया है और उसकी आंतें कैसे काम कर रही हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि आंतों में होने वाले ये बदलाव केवल पाचन क्रिया तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि इनका असर हमारे पूरे शरीर और खास तौर पर दिमाग पर भी पड़ सकता है. स्टडी के सीनियर ऑथर और प्रोफेसर लार्स ओवे ड्रगस्टेड ने चेतावनी देते हुए कहा कि हम जानते हैं कि प्रोटीन फर्मेंटेशन के नतीजे अक्सर सेहत के लिए नुकसानदेह होते हैं. इससे किडनी को नुकसान मूड पर असर या फोकस करने की क्षमता में कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं.
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