New Delhi: ईरान से तनाव के बीच अमेरिकी नौसेना ने पश्चिमी प्रशांत महासागर से अपने सबसे भरोसेमंद और घातक एयरक्राफ्ट कैरियर को हटाने का फैसला किया है. चीन हमेशा से पश्चिमी प्रशांत महासागर में अमेरिकी सेना की मौजूदगी को अपने लिए खतरा और ताइवान को अपने कब्जे में लेने के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट मानता आया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले से एशिया-पैसिफिक में मौजूद अमेरिका के दोस्त देश चिंता में पड़ गए हैं. उन्हें लग रहा है कि मुसीबत के वक्त वाशिंगटन उन्हें अकेला छोड़ सकता है.
अमेरिका के सहयोगियों में फैली घबराहट
दूसरी तरफ, बीजिंग अमेरिका के इस ध्यान भटकने और उसके सहयोगियों में फैली घबराहट से बेहद खुश है. मिडिल ईस्ट में ईरान के खिलाफ जारी जंग में अपनी पावर बढ़ाने के लिए यूएस नेवी अपने युद्धपोत यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को रवाना कर रही है, जो पैसिफिक में सहयोगी देशों की रक्षा के लिए तैनात था. अब ये महाकाय युद्धपोत ईरान जाकर यूएसएस एब्राहम लिंकन की जगह लेगा. लिंकन को इसी साल मई में वापस लौटना था, लेकिन ईरान से जारी जंग की वजह से इसकी तैनाती लगातार बढ़ाई जा रही है.
एक बड़ा सुरक्षा वैक्यूम पैदा
अमेरिका के इस कदम से पश्चिमी प्रशांत महासागर में एक बड़ा सुरक्षा वैक्यूम पैदा हो गया है, जिसका पूरा फायदा उठाने के लिए चीन पहले से घात लगाए बैठा है. पश्चिमी प्रशांत महासागर से एक मुख्य एयरक्राफ्ट कैरियर का हटना अमेरिका के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है. भले ही अमेरिकी अधिकारी ये दावा कर रहे हों कि यह खालीपन बहुत कम समय के लिए होगा और जल्द ही किसी दूसरे युद्धपोत को तैनात किया जाएगा, लेकिन रणनीतिक जानकार इसे अमेरिका की मजबूरी के रूप में देख रहे हैं.
अमेरिकी नौसैनिकों की मानसिक स्थिति को लेकर गंभीर सवाल
ईरान के साथ लंबे खिंचते जा रहे युद्ध की वजह से अमेरिकी नौसैनिकों की मानसिक स्थिति और राशन की कमी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. यूएसएस एब्राहम लिंकन युद्धपोत ने लगातार 240 से ज्यादा दिन समंदर में बिताए हैं, जो इस जहाज के इतिहास का एक नया रिकॉर्ड है. महीनों से बिना ब्रेक के ड्यूटी कर रहे सैनिकों की मानसिक हालत बिगड़ने लगी है. अमेरिकी संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने लिंकन युद्धपोत पर खराब होती स्थितियों को लेकर जांच और पारदर्शिता की मांग की है.
जरूरी सामान और हथियारों का संकट
लगातार महीनों तक समंदर में रहने के कारण जहाजों पर खान-पान, जरूरी सामान और हथियारों का संकट गहराने लगा है. ये पूरी अदला-बदली ऐसे समय में हो रही है जब चीन एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी मिलिट्री प्रेजेंस को तेजी से बढ़ा रहा है. वाशिंगटन के इस कदम पर सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के एक्सपर्ट ग्रेग पोलिंग का कहना है कि ‘अमेरिका की आधिकारिक नीति ये कहती है कि प्रशांत महासागर उसके लिए सबसे अहन क्षेत्र है. लेकिन हकीकत में जो हो रहा है, वो इसका ठीक उल्टा है. अमेरिका मिडिल ईस्ट से अपना सैन्य दखल कम करने का दावा करता था, लेकिन अब वो पूरी तरह वहीं उलझ कर रह गया है’.
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