Canada International Trade : भारत और कनाडा अपने आर्थिक रिश्तों को फिर से मजबूत करने की कोशिशो में जुटे हुए है. ऐसे में दोनो देशो के बीच CEPA यानी व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते पर बातचीत हो रहे हैं. इस समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे के बाजारों में कारोबार करना आसान बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इसमें सामान और सेवाओं के व्यापार से जुड़ी शर्तें, बाजार तक पहुंच और व्यापार की दूसरी बाधाएं शामिल होगी. दोनों देशों का लक्ष्य साल 2026 के आखिर तक समझौते को अंतिम रूप दिए जाना है. हालांकि अभी भी कई मुद्दे हैं, जिनपर आपसी सहमति बनना अभी बाकी है.
एयरोस्पेस, क्लीन एनर्जी और 70 अरब डॉलर…जानें भारत-कनाडा की CEPA ट्रेड डील में क्या-क्या है?
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कनाडा के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट कर कहा कि ‘अगला पड़ाव: भारत.’ उन्होंने बताया कि यह मिशन एयरोस्पेस, क्लीन एनर्जी, टेक्नोलॉजी, लाइफ साइंसेज, एग्री-फूड और फॉरेस्ट्री जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित रहेगा. कनाडा , भारत के साथ अपने कमर्शियल संबंध और मजबूत करना चाहता है.
बता दें कि भारत और कनाडा के बीच व्यापार पहले से ही काफी बड़ा है. कनाडा सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल व्यापार 30.4 अरब कनाडाई डॉलर रहा. अब दोनों देशों का लक्ष्य साल 2030 तक यह कारोबार बढ़कर दुगना यानी 70 अरब कनाडाई डॉलर तक पहुंचाना है. इस लक्ष्य को हासिल करने में CEPA काफी जरूरी रोल निभा सकता है.
वहीं, यदि व्यापार की बाधाएं कम होती हैं और कंपनियों को दूसरे देश में कारोबार करने के बेहतर मौके मिलते हैं, तो निर्यात और निवेश दोनों बढ़ सकते हैं. इसका फायदा भारतीय और कनाडाई कारोबारियों के साथ-साथ कुछ क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों को भी मिल सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था में बिजली, ईंधन और उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की मांग बढ़ रही है. ऐसे में कनाडा भारत के लिए ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण संभावित आपूर्तिकर्ता बन सकता है. इसका एक उदाहरण है तेल का. दरअसल, कनाडा दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, लेकिन भारत को उसका पहला तेल निर्यात साल 2024 में हुआ, जिसकी कीमत लगभग 15 करोड़ डॉलर थी. जबकि भारत हर साल लगभग 150 अरब डॉलर का तेल आयात करता है. इससे यह साफ है कि इस क्षेत्र में कितनी बड़ी संभावना मौजूद है. इस बातचीत में LNG पर खास ध्यान दिया जा रहा है. बता दें कि प्राकृतिक गैस को बहुत कम तापमान पर तरल बनाया जाता है, जिससे उसे जहाजों के जरिए एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाना आसान हो सके.
क्रिटिकल मिनरल्स यानी ऐसे महत्वपूर्ण खनिज, जिनकी जरूरत आधुनिक उद्योगों और तकनीक में होती है और जिनकी आपूर्ति बाधित होने का जोखिम भी हो सकता है. इनका इस्तेमाल बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, स्वच्छ ऊर्जा तकनीक और कई तरह के औद्योगिक उपकरणों में किया जाता है. वहीं, भारत अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाना चाहता है. इसके लिए जरूरी है कि उद्योगों को कच्चा माल लगातार मिलता रहे. कनाडा के साथ सहयोग से भारत को खनिजों की आपूर्ति, तकनीकी शोध और सप्लाई चेन विकसित करने में मदद मिल सकती है.
भारत में कनाडा के उच्चायुक्त क्रिस्टोफर कूटर ने कहा कि भारत की महत्वपूर्ण खनिजों की सूची में शामिल सभी 32 खनिज कनाडा के पास उपलब्ध हैं. कनाडा अपने खनन क्षेत्र को तेजी से विकसित कर रहा है और इसके लिए रेलवे सहित बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश किए जा रहे हैं. अभी भारत इन खनिजों में से कई की बहुत कम मात्रा कनाडा से आयात करता है. पोटाश का कुछ व्यापार होता है, जबकि तांबा और निकेल का व्यापार बेहद सीमित है. दूसरी ओर, कनाडा के पास लिथियम और ग्रेफाइट जैसे संसाधन हैं, जो इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों के लिए बेहद जरूरी हैं.
भारत और कनाडा के बीच बातचीत का एक और अहम क्षेत्र एयरोस्पेस है. इसमें विमान, विमान के पुर्जे, उनसे जुड़ी तकनीक और दूसरे एयरोस्पेस उपकरण शामिल हैं. दोनों देशों की कंपनियां इस क्षेत्र में मिलकर काम कर सकती हैं. इससे तकनीकी सहयोग, निवेश और औद्योगिक साझेदारी के अवसर पैदा हो सकते हैं. भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी है, क्योंकि वह अपने विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करना चाहता है. वहीं, कनाडाई कंपनियों को भारत के बड़े बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है.
कनाडा सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में कनाडा ने भारत को लगभग 3.9 अरब कनाडाई डॉलर का सामान निर्यात किया. इसमें सब्जियां, खनिज ईंधन और तेल तथा लकड़ी का गूदा जैसे उत्पाद प्रमुख थे. वहीं, कनाडा ने भारत से लगभग 9.7 अरब कनाडाई डॉलर का सामान आयात किया. इसमें कीमती पत्थर और धातुएं, मशीनरी तथा दवा उत्पाद शामिल थे. अगर ये नया समझौता कारोबार को आसान बनाता है, तो भारतीय कंपनियों को कनाडा में अपना बाजार बढ़ाने के मौके मिल सकते हैं. खासकर उन उद्योगों को फायदा हो सकता है, जो पहले से कनाडा को सामान बेच रहे हैं.
इस व्यापार समझौते के पीछे एक बड़ा कारण कनाडा की अपनी व्यापारिक रणनीति भी है. कनाडा का अमेरिका के साथ गहरा व्यापारिक रिश्ता है. लेकिन किसी एक बड़े बाजार पर बहुत ज्यादा निर्भरता होने से आर्थिक जोखिम भी पैदा हो सकते हैं. अमेरिका की टैरिफ नीति के बारे में तो हम सब जानते ही हैं. इसीलिए कनाडा अपने निर्यात के लिए दूसरे बाजारों में भी अवसर तलाश रहा है. भारत उसके लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प है. भारत की बड़ी आबादी, बढ़ती अर्थव्यवस्था और औद्योगिक जरूरतें कनाडाई कंपनियों के लिए नए मौके पैदा कर सकती हैं.
CEPA केवल सामान खरीदने और बेचने की डील नहीं है. यह दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को व्यापक बनाने का एक रास्ता भी है. इससे कारोबारियों को नए बाजार मिल सकते हैं, निवेश के अवसर बढ़ सकते हैं और रणनीतिक क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत हो सकती है. भारत के लिए ऊर्जा और जरूरी खनिजों की आपूर्ति महत्वपूर्ण है. वहीं, कनाडा के लिए भारत जैसे बड़े बाजार में कारोबार बढ़ाने की संभावना अहम है.