Hormuz Strait Blockade: होर्मुज संकट के बीच भारत के लिए संजीवनी बन सकती है ओमान-गुजरात गैस पाइपलाइन, ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया सहारा

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Hormuz Strait Blockade:  पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ी योजना पर काम कर रहा है. भारत और ओमान के बीच प्रस्तावित 2000 किलोमीटर लंबी डीप-सी गैस पाइपलाइन परियोजना एक बार फिर चर्चा में है. साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए गेम-चेंजर माना जा रहा है.

करीब 5 बिलियन डॉलर (लगभग 40 से 41 हजार करोड़ रुपये) की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना के तहत ओमान के रास अल जफांद क्षेत्र से गुजरात तट तक अरब सागर के नीचे प्राकृतिक गैस पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव है. परियोजना का उद्देश्य भारत को खाड़ी क्षेत्र से गैस आपूर्ति का एक स्थिर और वैकल्पिक माध्यम उपलब्ध कराना है.

दुनिया की सबसे गहरी गैस पाइपलाइनों में होगी शामिल

प्रस्तावित मिडिल ईस्ट-इंडिया डीपवाटर पाइपलाइन (MEIDP) समुद्र की सतह से लगभग 3400 से 3450 मीटर की गहराई से गुजरेगी. इतनी गहराई पर पाइपलाइन बिछाना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है. इसी वजह से यह दुनिया की सबसे गहरी और जटिल समुद्री गैस पाइपलाइन परियोजनाओं में शामिल हो सकती है. परियोजना के जरिए भारत को प्रतिदिन लगभग 31 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर (MMSCMD) प्राकृतिक गैस की आपूर्ति हो सकेगी. यह गैस भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

LNG आयात की तुलना में कम होगा खर्च

वर्तमान में भारत अपनी गैस जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर एलएनजी (Liquefied Natural Gas) आयात करता है. इस प्रक्रिया में प्राकृतिक गैस को पहले तरल रूप में बदला जाता है, फिर विशेष जहाजों के जरिए भारत लाया जाता है और उसके बाद दोबारा गैस में परिवर्तित किया जाता है. पाइपलाइन के जरिए गैस आपूर्ति होने पर यह पूरी प्रक्रिया काफी हद तक सरल हो जाएगी. उपलब्ध आकलनों के अनुसार पाइपलाइन के माध्यम से गैस आयात करने पर प्रति mmBtu लागत में उल्लेखनीय बचत संभव है, जिससे ऊर्जा आयात पर होने वाला खर्च कम हो सकता है.

भारत के लिए क्यों अहम है यह परियोजना?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. इन आयातों का महत्वपूर्ण भाग खाड़ी देशों से आता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.यदि इस समुद्री मार्ग में किसी प्रकार की रुकावट आती है तो तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति, शिपिंग लागत और ईंधन कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है. हाल के भू-राजनीतिक तनावों ने इस जोखिम को फिर से उजागर किया है और वैकल्पिक ऊर्जा मार्गों की आवश्यकता को मजबूत किया है.

कई देशों की गैस तक मिल सकती है पहुंच

प्रस्तावित पाइपलाइन का मार्ग ओमान और यूएई के रास्ते अरब सागर से होकर गुजरने के लिए तैयार किया गया है, जिससे संवेदनशील क्षेत्रों और संभावित भू-राजनीतिक जोखिमों से बचा जा सके. इस परियोजना के माध्यम से भारत को ओमान, यूएई, सऊदी अरब, कतर, ईरान और तुर्कमेनिस्तान जैसे गैस समृद्ध देशों की आपूर्ति तक पहुंच मिल सकती है.

2030 के ऊर्जा लक्ष्य को मिलेगा बल

भारत वर्ष 2030 तक अपने ऊर्जा मिश्रण में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को मौजूदा लगभग 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखता है. ऐसे में ओमान-भारत डीप-सी गैस पाइपलाइन परियोजना इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. प्राकृतिक गैस को अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है और इसकी उपलब्धता बढ़ने से बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग और अन्य क्षेत्रों को भी लाभ मिल सकता है. भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग और ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों को देखते हुए यह परियोजना आने वाले वर्षों में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.

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