India Artificial Sun: चांद तारे तोड़ने की बात आपने सुनी होगी, लेकिन अब भारतीय वैज्ञानिकों ने सूरज तोड़ने वाली बात कर दिखाया है. गुजरात के इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च में सूरज को धरती पर उतारने में वैज्ञानिकों ने बड़ी कामयाबी हासिल की है. इसे SST-1 नाम दिया गया है जो सूरज से भी 10 से 15 गुना ज्यादा गर्मी पैदा करने वाला है. यही वजह है कि इसे आर्टिफिशियल सन कहा जा रहा है. भारत से पहले चीन भी ऐसा कर चुका है.
सूरज आखिर करोड़ों साल से बिना रुके इतनी एनर्जी कैसे दे रहा है. वैज्ञानिक लंबे समय से इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश कर रहे हैं. अब भारत ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है. गुजरात के इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च यानी IPR में वैज्ञानिकों ने एक नई अत्याधुनिक हीटिंग प्रणाली को SST-1 टोकामक के साथ जोड़ा है. यह एक 400 किलोवाट और 82.6 गीगाहर्ट्ज़ वाला जाइरोट्रोन है. इनसे होने वाली प्रक्रिया सूरज की तरह नजर आती है और उससे ज्यादा गर्मी पैदा करती है. खास बात ये है कि न तो ये धूप देगा और न ही गर्मी, फिर सवाल ये है कि आखिर वैज्ञानिक इससे क्या करने वाले हैं?
क्या होता है जाइरोट्रॉन?
बता दें कि जाइरोट्रॉन एक बेहद शक्तिशाली मशीन होती है जो हाईपावर माइक्रोवेव्स पैदा करती हैं. यह बिजली और चुंबकीय शक्ति का इस्तेमाल करके खतरनाक तरंगे बनाता है जो सूरज या उससे ज्यादा गर्मी पैदा कर सकती है. इसके लिए एक चुंबकीय क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन्स को गोल गोल घुमाया जाता है. इससे एनर्जी निकलती है. इसका मुख्य काम न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टरों में होता है जहां गैस को करोड़ों डिग्री सेल्सियस तक गर्म करके आर्टिफिशियल सन बनाया जाता है.
SST-1 क्या है, जिसे वैज्ञानिकों ने इससे जोड़ा
SST-1 यानी स्टेडी स्टेट सुपरकंडक्टिंग टोकामक-1 भारत की एक विशेष फ्यूजन रिसर्च मशीन है. यह डोनेट की तरह है, जिसका मकसद इस बात पर रिसर्च करना है कि इतने हल्के इलेक्ट्रॉन मिलकर भी इतनी भारी मात्रा में ऊर्जा पैदा कैसे करते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक यही प्रक्रिया सूरज व अन्य तारों में भी लगातार चलती रहती है. अगर इस तकनीक को समझ लिया गया तो दुनिया को आर्टिफिशियल सन के माध्यम से इतनी एनर्जी दी जा सकती है जिसकी कोई सीमा नहीं है.
सूरज से भी ज्यादा गर्म है प्लाज्मा
फ्यूजन रिएक्टर के अंदर एनर्जी को प्लाज्मा में बदला जाता है. प्लाज्मा तब बनता है जब परमाणु से इलेक्ट्रॉन अलग हो जाते हैं.इससे पहले भारत के वैज्ञानिक SST-1 में 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान वाला प्लाज्मा तैयार कर चुके हैं. यह सूरज से कई गुना ज्यादा है, क्योंकि सूरज के केंद्र का तापमान तकरीबन डेढ़ करोड़ डिग्री सेल्सियस माना जाता है. हालांकि वैज्ञानिकों के सामने चुनौती उस तापमान को हासिल करना नहीं है, बल्कि इस गर्म प्लाज्मा को लंबे समय तक कंट्रोल करना है.
नया जाइरोट्रॉन क्या करेगा?
जाइरोट्रॉन असल में प्लाज्मा को गर्म करने का काम करता है. यह पैदा हो रही एनर्जी को कंट्रोल करने में मदद करेगा. फिलहाज जिस जाइरोट्रॉन का इस्तेमाल हो रहा है वह 42 82.6 गीगाहर्ट्ज़ सिस्टम 400 किलोवाट तक रेडियो फ्रीक्वेंसी पावर पैदा कर सकता है. हालांकि एक जो बड़ी समस्या है वह ये है कि सूरज के पास अपनी ग्रैविटी भी है. इसीलिए गर्म प्लाज्मा भी उससे बंधे रहते हैं, जबकि धरती पर चाहकर भी इतनी ग्रैविटी नहीं बनाई जा सकती. इसीलिए टोकामक में प्लाज्मा को कंट्रोल करने के लिए चुंबकीय शक्ति का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसलिए क्योंकि अगर ये मशीन की दीवारों से टकरा गया तो प्रयोग असफल हो जाएगा.
भविष्य में क्या करेगा भारत?
फिलहाल भारत का फोकस सिर्फ ये जानना है कि आखिर सूरज लंबे समय तक खुद को कैसे गर्म रखता है. अगर इस दुविधा को सुलझा लिया गया तो भविष्य में इससे बिजली पैदा की जा सकती है. हालांकि पहले वैज्ञानिकों को ये साबित करना होगा कि फ्यूजन से सुरक्षित तरीके से ऐसा किया जा सकता है.

