पोलैंड ने आतंकवाद के खिलाफ भारत के कदम को बताया सराहनीय, बांग्लादेश लिबरेशन वॉर को भी किया याद

New Delhi: भारत में पोलैंड के राजदूत पियोत्र एंटोनी स्विटाल्स्की ने आतंकवाद के खिलाफ भारत के कदम को सराहनीय बताया है. इससे एक दिन पहले उन्होने भारत की सराहना भी की थी. इसके साथ ही उन्होंने साल 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भारत के लिए पोलैंड के सपोर्ट को याद किया. उन्होंने बताया कि बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भारतीय सेना ने पोलिश टैंकों का यूज किया था. पोलैंड ने तुरंत ही बांग्लादेश को एक देश के तौर पर रिकोगनाइज किया था.

पोलैंड के कूटनीतिक रुख की ओर भी इशारा

उन्होंने कहा कि भारतीय सेना ने बांग्लादेश को आज़ाद कराने के लिए पोलिश टैंकों का इस्तेमाल किया था. यह एक मशहूर कहानी है. पियोत्र एंटोनी स्विटाल्स्की ने इस संघर्ष के दौरान पोलैंड के कूटनीतिक रुख की ओर भी इशारा किया. उन्होंने कहा कि साफ है कि हम आपके पक्ष में थे. उनकी बातें भारत-पोलैंड संबंधों के एक कम चर्चित पहलू पर ध्यान दिलाती हैं, जिसमें रक्षा सहयोग, संयुक्त राष्ट्र में कूटनीति और बांग्लादेश की आज़ादी के लिए वारसॉ का शुरुआती समर्थन शामिल है. बांग्लादेश मुक्ति संग्राम 25 मार्च 1971 को शुरू हुआ.

हिंसा से एक बड़ा मानवीय संकट

पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में दमनकारी कार्रवाई शुरू की. इस हिंसा से एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया और लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) शरणार्थी भारत आ गए. भारत दिसंबर में सीधे युद्ध में शामिल हुआ और मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर लड़ा. 16 दिसंबर को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया, जिसके बाद बांग्लादेश का गठन हुआ. पोलैंड ने मुख्य रूप से एक ऐसे राजनीतिक समाधान का समर्थन किया जो पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करे, न कि इस संकट को केवल भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव के तौर पर देखे.

प्रतिनिधियों को सत्ता सौंपने की बात

पोलैंड का सबसे मज़बूत कूटनीतिक कदम दिसंबर 1971 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाया गया. पोलैंड ने एक ड्राफ्ट रेजोल्यूशन (मसौदा प्रस्ताव) में पूर्वी पाकिस्तान के लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को सत्ता सौंपने की बात कही. इसमें युद्धविराम और उस इलाके से पाकिस्तानी सेना को हटाने का भी प्रस्ताव था. यह प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने पाकिस्तान के 1970 के चुनावों से मिले जनादेश को मान्यता दी थी, जिसमें शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग को बहुमत मिला था. पौलेंड का यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका. लेकिन इसका असर चुनाव नतीजों और पाकिस्तानी सेना की वापसी का आधार बना. यह पौलेंड का बांग्लादेश के लिए राजनीतिक समाधान दिखाता था.

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