अमेरिका में भी नेपाल जैसी तबाही का खतरा, 33 लाख लोगों पर पड़ेगा प्रभाव

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Mount Rainier Volcano: नेपाल में बुधवार को अचानक आए फ्लैश फ्लड ने जिस तरह तबाही मचाई, कुछ वैसी ही तबाही अमेरिका के सिर पर भी बैठा है. नेपाल में इस हादसे के बाद अमेरिका के एक बेहद खतरनाक ज्वालामुखी को लेकर पुरानी चेतावनियां फिर चर्चा में आ गई हैं. दरअसल, अमेरिका के वॉशिंगटन राज्य में मौजूद माउंट रेनियर ऐसा ज्वालामुखी है, जो सिर्फ फटने पर ही खतरा नहीं बनता. बल्कि इसकी बर्फ से ढकी विशाल ढलानों पर भूस्खलन, ग्लेशियर पिघलने, तेज बारिश या छोटा भूकंप भी ऐसी विनाशकारी बाढ़ पैदा कर सकता है, जो पानी, मिट्टी, चट्टान और मलबे को अपने साथ बहाते हुए कुछ ही मिनटों में रास्ते में आने वाली चीजों को तबाह कर दे.

इस दौरान सबसे बड़ी चिंता इसलिए है क्योंकि सिएटल-टकोमा मेट्रो क्षेत्र में 33 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं, जबकि 60 हजार से ज्यादा लोग सीधे उस इलाके में हैं, जिसे माउंट रेनियर से आने वाले लहार यानी मलबे के तेज बहाव का खतरा माना जाता है.

नेपाल की तबाही ने फिर याद दिलाया खतरा

बता दें कि नेपाल में हुई प्राकृतिक आपदा में करीब 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग लापता हैं. इस दौरान माना गया कि हिमस्खलन या ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटने से यह तबाही शुरू हुई. बर्फ का विशाल टुकड़ा हजारों फीट नीचे गिरा और पानी, चट्टानों तथा मलबे के साथ मिलकर अचानक तेज बहाव में बदल गया. यह बहाव नदी घाटी की तरफ बढ़ा और रास्ते में भारी तबाही मच गई. ऐसे में माउंट रेनियर को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता भी कुछ ऐसी ही अचानक आने वाली प्राकृतिक घटना को लेकर है. फर्क सिर्फ इतना है कि यहां तबाही के लिए ज्वालामुखी का फटना जरूरी नहीं है.

ज्वालामुखी नहीं फटेगा, फिर भी आ सकती है तबाही

दरअसल, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS के अनुसार, माउंट रेनियर के जल्द फटने के कोई संकेत नहीं हैं. एजेंसी का कहना है कि यह ज्वालामुखी किसी तय समय पर विस्फोट करने के लिए बकाया नहीं है. लेकिन खतरा दूसरी जगह है. उनका कहना है कि माउंट रेनियर भारी ग्लेशियरों से ढका हुआ है. इसकी ढलान का कोई हिस्सा यदि भूस्खलन की वजह से टूटता है या ग्लेशियर और बर्फ तेजी से पिघलती है, तो पानी के साथ मिट्टी, चट्टान और मलबा नीचे की ओर भाग सकता है. इसी तेज बहाव को लहार कहा जाता है.

गीले सीमेंट जैसा बहता है लहार

अमेरिका पहले भी देख चुका है ऐसी तबाही

भूवैज्ञानिको के अनुसार, माउंट रेनियर का खतरा समझने के लिए 1980 के माउंट सेंट हेलेंस हादसे को याद किया जाता है. द डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक उस विस्फोट के दौरान ज्वालामुखी का उत्तरी हिस्सा ढह गया और गर्म पाइरोक्लास्टिक बहाव ने ग्लेशियर की बर्फ को तेजी से पिघला दिया. इसके बाद पानी, मिट्टी और मलबे की विशाल धाराएं नदी घाटियों में कई दर्जन मील तक चली गईं. इस आपदा में 200 से ज्यादा घर, 195 मील सड़कें और 27 पुल तबाह हो गए थे.
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