11 वर्षो में नहीं मिली एक फूटी कौड़ी, पीयूष गोयल ने जर्मनी में विकसित देशों को सुनाई खरी-खोटी

Aarti Kushwaha
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Paris Climate Agreement: जर्मनी की राजधानी में बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में एक गोलमेज चर्चा को संबोधित करते हुए केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु संबंधी जिम्मेदारियों को लेकर विकसित देशों के रिकॉर्ड की आलोचना की है. उन्होंने कहा कि अमीर देश और यूरोपीय संघ ने विकासशील देशों को जलवायु के लिए पैसे देने का जो वादा किया था, उसे पूरा नहीं कर रहे हैं.

उद्योग मंत्री ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में इन देशों का सबसे बड़ा हिस्सा रहा है, लेकिन अब वे पेरिस समझौते के तहत विकासशील और कमजोर देशों को दी जाने वाली वित्तीय और तकनीकी मदद के अपने वादे से पीछे हट रहे हैं.

’11 सालों में एक फूटी कौड़ी नहीं मिली’

पीयूष गोयल ने कहा कि “साल 2015 के पेरिस जलवायु सम्मेलन में, जब पूरी दुनिया एक साथ आई थी, तब प्रधानमंत्री मोदी ने ही ‘ग्लोबल साउथ’ को एकजुट किया और देशों को COP21 में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रतिबद्ध होने के लिए प्रोत्साहित किया. उस वक्त यह सहमति बनी थी कि विकसित देश, जिन्होंने कई दशकों तक जलवायु को नुकसान पहुंचाकर फायदा उठाया है. वे इसकी बड़ी कीमत चुकाएंगे. वे विकासशील और कम विकसित देशों के साथ-साथ प्रशांत और कैरेबियन क्षेत्रों के द्वीपीय देशों की मदद करेंगे. हर साल 100 अरब डॉलर की मदद देंगे. यही वह प्रतिबद्धता थी.”

लेकिन लंबे समय से कोई कदम न उठाए जाने पर नाराजगी जताते हुए पीयूष गोयल ने कहा कि “11 साल बीत जाने के बाद भी, हमें उसका एक पैसा भी नहीं मिला है. ये सब सिर्फ वादे हैं. यह एक ऐसा बड़ा सवाल है जिसका जवाब देने में यूरोपीय संघ और CBAM (कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म) नाकाम रहे हैं.”

‘डीकार्बोनाइजेशन’ के प्रयासों में नाकाम रहा यूरोप

बता दें कि 2009 में कोपेनहेगन में आयोजित ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज’ (UNFCCC) के 15वें सम्मेलन में, विकसित देशों ने विकासशील देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए 2020 तक हर साल 100 अरब अमेरिकी डॉलर जुटाने का वादा किया था. लेकिन पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 28 जुलाई 2022 को जारी एक बयान में बताया कि 2015 में पेरिस में हुए COP21 सम्मेलन में, जब विकसित देश अपना वादा पूरा करने में विफल रहे, तो इस 100 अरब अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष के लक्ष्य को 2025 तक बढ़ाने का फैसला लिया गया.

उन वादों की याद दिलाते हुए गोयल ने आगे कहा, “वे कम विकसित देशों की जरूरतों को पूरा करने या उनके ‘डीकार्बोनाइजेशन’ (कार्बन उत्सर्जन कम करने) के प्रयासों में मदद करने में नाकाम रहे हैं.”

“हमारी बड़ी आबादी लेकिन कार्बन उत्सर्जन कम”

वाणिज्य और उद्योग मंत्री ने पश्चिमी देशों और भारत के बीच जनसंख्या के आकार और कार्बन उत्सर्जन की मात्रा में मौजूद भारी अंतर को भी उजागर करते हुए सवाल किया कि “आखिर इस गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार कौन है? ओजोन परत को नुकसान कहां पहुंचा? वातावरण में इतना सारा कार्बन किसने भेजा? उन्होंने कहा कि मैं दुनिया की 17% आबादी का प्रतिनिधित्व करता हूं, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में मेरा योगदान 3% से भी कम है. आप (यूरोप) शायद दुनिया की 3% या 4% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, फिर भी कार्बन उत्सर्जन, यानी इस पूरी समस्या में आपका योगदान बहुत बड़ा है. यह समस्या आपकी वजह से पैदा हुई है.”

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पश्चिमी देशों के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट, यूरोप के स्तर की अपेक्षा बहुत कम है. उन्होंने कहा कि “आज भी, जब हम यहां बैठे हैं, तो कार्बन उत्सर्जन में मेरा प्रति व्यक्ति योगदान शायद आपके योगदान का 10% या 15% ही है. आज भी, कार्बन उत्सर्जन में यूरोप का प्रति व्यक्ति योगदान और पर्यावरण पर उसका प्रति व्यक्ति प्रभाव भारत की तुलना में शायद 7 या 8 गुना अधिक है. मैं दुनिया की 17% आबादी का प्रतिनिधित्व करता हूँ, और मैं कचरे तथा सर्कुलर इकॉनमी को लेकर कहीं अधिक जागरूक हूं.”

भारत की घरेलू विकास संबंधी मजबूरियों और साथ ही ग्रीन एनर्जी की ओर तेजी से बढ़ते कदमों का जिक्र करते हुए, गोयल ने कहा कि “मुझे 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा संबंधी जरूरतों और भोजन की जरूरतों को पूरा करना है, और यह सुनिश्चित करना है कि मेरा देश सुरक्षित रहे. इन सबके बावजूद, हमारे पास दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रमों में से एक है.”

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