Russia afghanistan army cooperation: रूस और तालिबान ने एक ऐसे सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे पाकिस्तान को मिर्ची लग सकती है. दरअसल इस समझौते में हथियारों का आदान-प्रदान, लाइसेंसिंग, सैन्य तकनीकें और संयुक्त विकास परियोजनाएं शामिल हैं. बता दें कि अफगानिस्तान की स्थिरता भारत-रूस बातचीत के एजेंडे में रही है, जो नई दिल्ली के लिए भी दिलचस्पी का विषय होगा, जिसने पाकिस्तान के सैन्य हमलों के सामने काबुल की संप्रभुता का समर्थन किया है.
मालूम हो कि यह पहला रक्षा समझौता है, जो मौजूदा तालिबान शासन ने किसी देश के साथ किया है. इस डील पर सप्ताह मॉस्को में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा फोरम के दौरान हस्ताक्षर किए गए. इससे पता चलता है कि काबुल की कोशिश पाकिस्तान की सेना की आक्रामकता के खिलाफ सैन्य समर्थन पाने की है.
मॉस्को में हुआ समझौता
इस समझौते पर तालिबान के रक्षा मंत्री मौलवी मोहम्मद याकूब और रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु के बीच बैठक के बाद हस्ताक्षर किए गए, जिसमें हथियारों का आदान-प्रदान, लाइसेंसिंग, सैन्य तकनीकें और संयुक्त विकास परियोजनाएं शामिल हैं. इस दौरान मोहम्मद याकूब ने रूस के साथ संबंधों को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि रूस के साथ बातचीत हमारे लिए बहुत मायने रखती है.
संबंधों को सुधारने पर जोर
तालिबानी रक्षा मंत्री ने कहा कि अफगानिस्तान और रूस के बीच लंबे और ऐतिहासिक संबंध हैं. हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं. वहीं, रूसी मंत्री शोइगु ने कहा कि पश्चिमी देशों को अफगानिस्तान की जब्त की गई संपत्तियों को जारी करना चाहिए. उन्हें अपनी 20 साल की मौजूदगी स्वीकारते हुए अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में योगदान देना चाहिए.
वहीं, इस समझौते के बाद तालिबानी रक्षा मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय सहयोग और कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की लेकिन उन्होंने इसका कोई विवरण नहीं दिया. मॉस्को ने धीरे-धीरे तालिबान 2.0 के साथ अपनी भागीदारी को मजबूत किया है. वह तालिबान सरकार के करीब आ रहा है.

