New Delhi: अगस्त, 2026 में मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसे मक्का पैक्ट कहा जा रहा है. इसमें नाटो के आर्टिकल 5 के तहत कहा गया है कि किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा. यह नाटो जैसे सामूहिक रक्षा सिद्धांत पर आधारित है. यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के दक्षिणी इलाकों में ऊर्जा सुविधाओं पर हमले किए. सऊदी ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक कई जगहों पर आग लग गई और कुछ ऑपरेशन अस्थायी रूप से बंद करने पड़े.
खतरनाक उकसावे और संप्रभुता का उल्लंघन
कई लोग घायल भी हुए और सऊदी गठबंधन के प्रवक्ता ने आभा, खमिस मुशैत, जिजान और नजरान प्रांतों में नागरिक और आर्थिक ठिकानों पर हमलों को खतरनाक उकसावे और संप्रभुता का उल्लंघन बताया. हूती पक्ष ने अभी कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन पहले उन्होंने सऊदी पर जेल पर एयर स्ट्राइक का आरोप लगाया था.सवाल यह है कि हूती हमलों के बाद क्या पाकिस्तान और तुर्की सक्रिय रूप से सऊदी की लड़ाई में शामिल होंगे? संभावना दोनों तरफ है.
चुप रहे तो समझौता सिर्फ कागजी साबित
एक ओर पैक्ट की विश्वसनीयता दांव पर है. अगर सऊदी पर हमले जारी रहे और सहयोगी चुप रहे तो समझौता सिर्फ कागजी साबित होगा. पहले भी कुछ हमलों के बाद तुर्की और पाकिस्तान से स्पष्ट सैन्य प्रतिक्रिया नहीं आई थी. दूसरी ओर दोनों देशों के अपने हित और सीमाएं हैं. पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी के साथ सुरक्षा सहयोग रखता है. हजारों पाकिस्तानी सैनिक पहले भी सऊदी में तैनात रहे हैं. आर्थिक मदद और धार्मिक संबंध मजबूत हैं.
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हूती हमलों की निंदा
तीनों देश संयुक्त रूप से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हूती हमलों की निंदा कर सकते हैं और संयुक्त राष्ट्र के जरिए दबाव बढ़ा सकते हैं. सऊदी ऊर्जा सुविधाओं पर हमले वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित करते हैं, इसलिए पश्चिमी देश भी चिंतित हैं. मक्का पैक्ट को सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक-आर्थिक गठबंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. चुनौतियां कई हैं लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ये है कि पैक्ट में सैन्य दायित्वों का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक नहीं है.
खुद भी पूर्ण युद्ध नहीं चाहता सऊदी
ईरान इस गठबंधन को अपने खिलाफ देख सकता है, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ेगा. घरेलू स्तर पर पाकिस्तान और तुर्की अपनी जनता को यमन जैसे दूर के संघर्ष में उलझाने से बच सकते हैं. सऊदी खुद भी पूर्ण युद्ध नहीं चाहता. उसका फोकस आर्थिक विकास और विजन 2030 पर है. कुल मिलाकर, मक्का पैक्ट के देश फिलहाल पूर्ण युद्ध में कूदने के बजाय नियंत्रित समर्थन, समुद्री सुरक्षा और कूटनीतिक दबाव का रास्ता अपनाएंगे.
ऊर्जा सुविधाओं को भारी नुकसान
अगर हूती हमले और बढ़े या ऊर्जा सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा तो दबाव बढ़ेगा और सीमित सैन्य भूमिका संभव है. यह समझौता अभी अपनी पहली बड़ी परीक्षा दे रहा है. इसकी कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि तीनों देश कितनी एकजुटता और व्यावहारिकता दिखाते हैं. यमन संघर्ष सिर्फ सऊदी-हूती मुद्दा नहीं रह गया है. यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और नए गठबंधनों की परीक्षा बन चुका है.
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