SCO Summit 2026: SCO शिखर सम्मेलन से पहले हर साल भारत-चीन और रूस का गठजोड़ अमेरिका को बेचैन कर देता है. एक बार फिर से किर्गिस्तान से कुछ ऐसी तस्वीरें आने वाली हैं, जिससे अमेरिका की बौखलाहट बढ़ने वाली हैं. वैसे तो इसी सम्मेलन में पाकिस्तान भी होगा, जो कभी नहीं चाहेगा कि ये मुलाकात किसी बड़े नतीजे में तब्दील हो.
मोदी की पुतिन से द्विपक्षीय मुलाकात तय है, जबकि शी जिनपिंग से भी साइडलाइंस पर बातचीत की संभावना जताई जा रही है. यह तिकड़ी पिछले कुछ वर्षों में कई मौकों पर एक साथ दिखी है, लेकिन मौजूदा समय में इसकी अहमियत और बढ़ गई है. दरअसल, ये उन देशों का संगठन है, जो सिर्फ दक्षिण एशिया की शक्तियों के सहयोग के लिए महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि ग्लोबल पावर बैलेंस में भी इसकी अहम भूमिका है. खासतौर पर भारत-चीन के नेताओं की आमने-सामने की मुलाकात इसे और भी खास बना देती है.
SCO की भूमिका और एजेंडा
बता दें कि SCO की स्थापना साल 2001 में चीन, रूस और मध्य एशियाई देशों ने की थी. जिसके बाद भारत और पाकिस्तान 2017 में, ईरान 2023 में और बेलारूस 2024 में इसके पूर्ण सदस्य बने. अब यह संगठन करीब 3.4 अरब आबादी और वैश्विक GDP के एक चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है.
वहीं, बिश्केक समिट में इस संगठन के 25 साल पूरे हो रहे हैं. इसका थीम है – 25 Years of the SCO: Together Towards Sustainable Peace, Development and Prosperity. इस एजेंडे में आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता, सीमापार खतरे, यूरेशियन परिवहन कॉरिडोर, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और व्यापार सुविधा शामिल हैं.
इसके अलावा, SCO विकास बैंक और कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर भी चर्चा होने वाली है. बिश्केक घोषणापत्र अंतिम रूप लेगा, साथ ही किर्गिस्तान की अध्यक्षता पाकिस्तान को सौंपी जाएगी. वहीं, भारत के लिए यह मंच मध्य एशिया से व्यापार, ऊर्जा और कनेक्टिविटी बढ़ाने का अवसर है.
आतंकवाद के मुद्दे को उठाएगा भारत
बता दें कि पीएम मोदी ने शिखर सम्मेलन में जाने से पहले कहा था कि वे क्षेत्र में सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसर की दृष्टि से आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन इस मंच पर पाकिस्तान भी मौजूद रहता है, ऐसे में भारत आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से मुक्त क्षेत्र के लिए बात करेंगे. वहीं, पिछले साल बीजिंग में हुए एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान ही पहलगाम में हुए आतंकी हमले पर भारत ने अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी.
मोदी-पुतिन-शी की मुलाकात क्यों खास
भारत, चीन और रूस की ये तिकड़ी पश्चिमी नेतृत्व वाले विश्व व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखी जाती है. फिलहाल, रूस पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और चीन-भारत संबंधों में हाल के वर्षों में सीमा विवाद के बावजूद कुछ सुधार के संकेत दिखे हैं. दरअसल, भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ क्वाड जैसे मंचों पर भी सक्रिय है, लेकिन SCO जैसे मंचों से वह रूस और मध्य एशिया से जुड़ाव मजबूत करता है. पुतिन और शी अक्सर SCO को पश्चिमी प्रभाव के मुकाबले एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं. मोदी की उपस्थिति भारत को संतुलन बनाए रखने का मौका देती है. भारत न तो पूरी तरह चीन-रूस गुट में शामिल होता है और न ही पश्चिम से दूरी बनाता है. ये मल्टीलेटरल पॉलिसी भारत की विदेश नीति का अहम हिस्सा है.

