STERS technology: चीनी वैज्ञानिकों ने एक ऐसा लाइफलाइक हाइड्रोजेल तैयार किया है, जो जीवित इंसानी कोशिकाओं और टिश्यूज की तरह ही अपनी बनावट और आकार बदल सकता है. चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया ये रिसर्च मेडिकल साइंस, बायोटेक्नोलॉजी और रोबोटिक्स के क्षेत्र में एक ऐसा तूफान लेकर आई है, जो आने वाले समय में अस्पतालों और सर्जिकल थिएटर्स का पूरा तरीका ही बदल देगा.
क्या है ये हाइड्रोजेल, कैसे काम करता है ये STERS सिस्टम?
दरअसल, अब तक विज्ञान की दुनिया में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक, सिलिकॉन या मेटल जैसी बेजान चीजें वक्त के साथ खुद से बदल नहीं सकती थीं. अगर उनका आकार बदलना भी होता था, तो उस पर कोई भारी-भरकम बाहरी दबाव या गर्मी देनी पड़ती थी, लेकिन इंसान का शरीर ऐसे काम नहीं करता. जब हमारी चमड़ी पर कोई घाव लगता है, या जब मां के पेट में बच्चा बढ़ता है, तो कोशिकाएं बहुत धीरे-धीरे और कुदरती तरीके से ढलती हैं.
चीन की वैज्ञानिकों ने इसी कुदरती प्रक्रिया की नकल करके एक नया सिस्टम विकसित किया है, जिसे ‘STERS’ (Spatiotemporally Evolving Reactive Species) नाम दिया गया है. इस पूरे चमत्कार के पीछे असली ताकत ‘लिक्विड मेटल’ की है.
- गैलियम आधारित कण: वैज्ञानिकों ने हाइड्रोजेल के अंदर गैलियम धातु के बेहद सूक्ष्म, लिक्विड कण मिलाए हैं.
- लाइट से एक्टिवेशन: जब इस हाइड्रोजेल पर नियर-इन्फ्रारेड लाइट डाली जाती है, तो लिक्विड मेटल के अंदर एक खास केमिकल रिएक्शन शुरू हो जाता है.
- चार हफ्तों तक चलने वाला जादू: सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि इसमें बार-बार लाइट डालने की जरूरत नहीं पड़ती. एक बार लाइट पड़ने के बाद ये रिएक्शन अगले पूरे 28 दिनों तक अपने आप चलता रहता है. लिक्विड मेटल की सतह ऑक्सीडाइज होती है, परत हटती है और नया मेटल सामने आता है. ये प्रक्रिया धीरे-धीरे जल के आकार को बिना किसी बाहरी मदद के बदलती रहती है.
इंसान के शरीर में कैसे उगेगी हड्डी?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब किसी दुर्घटना या बीमारी के कारण शरीर की कोई बड़ी हड्डी टूट जाती है या नष्ट हो जाती है, तो डॉक्टर वहां कृत्रिम रॉड या ढांचा लगाते हैं. लेकिन पुराना ढांचा मरीज के शरीर के बढ़ने के साथ खुद नहीं बदल पाता. ऐसे में इस नए हाइड्रोजेल पर वैज्ञानिकों ने जब स्टेम सेल्स को रखा, तो नतीजे देखकर पूरी टीम हैरान रह गई. इस हाइड्रोजेल ने न केवल स्टेम सेल्स को सहारा दिया, बल्कि उन्हें इंसानी हड्डियों और नर्व सेल्स में बदलने के लिए रास्ता दिखाया. यानी ये जेल शरीर में जाते ही एक ऐसा नेचुरल माहौल बना देता है, जहां कोशिकाएं खुद-ब-खुद नई हड्डियां और नसें बनाना शुरू कर देती हैं. जैसे-जैसे नई हड्डी बनती जाती है, ये जेल अपनी बनावट बदलकर उसके अनुकूल होता चला जाता है.
लकवा के मरीजों के लिए वरदान
आज के समय में न्यूरोलॉजिकल बीमारियों और लकवा के इलाज के लिए इंसान के दिमाग में ‘ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस’ (BCI) यानी सिलिकॉन चिप्स लगाने की होड़ मची है. लेकिन कड़े और सख्त मटेरियल से बने ये चिप्स दिमाग की बेहद नाजुक नसों को नुकसान पहुंचाते हैं और कई बार शरीर उन्हें रिजेक्ट कर देता है. हालांकि चीन के इस हाइड्रोजेल ने इस पूरी बहस को ही खत्म कर दिया है.
- दिमाग से पूरी तरह तालमेल: रिसर्च टीम के प्रमुख प्रोफेसर दू शुएमिन के अनुसार, उन्होंने इस फ्लेक्सिबल हाइड्रोजेल से इलेक्ट्रोड की ऊपरी परत तैयार की. जब इसे चूहों के भ्रूण के दिमाग पर आजमाया गया, तो ये जेल दिमाग के बढ़ने की रफ्तार के साथ-साथ खुद को ढालता चला गया.
- बिना नुकसान सिग्नल्स की रिकॉर्डिंग: चूंकि ये जेल दिमाग की नसों जितना ही सॉफ्ट और लचीला है, इसलिए इसने बिना किसी सूजन या जख्म के दिमाग की तरंगों को एकदम सटीक तरीके से रिकॉर्ड किया.
- लकवा मरीजों में नई उम्मीद: रीढ़ की हड्डी टूटने से जब दिमाग का कनेक्शन शरीर से टूट जाता है, तब ये हाइड्रोजेल टूटी हुई नसों को दोबारा जोड़ने के लिए एक लचीले पुल का काम कर सकता है. इससे लकवाग्रस्त मरीजों को बिना किसी कड़े ब्रेन-चिप के अपने हाथ-पैर हिलाने में सफलता मिल सकती है.
बेजान लोहे के रोबोट्स को मिलेगी इंसानी त्वचा
अगर आप सोच रहे हैं कि ये खोज केवल अस्पतालों तक सीमित रहेगी, तो ऐसा नहीं है. ये तकनीक रोबोटिक्स की दुनिया का भी नक्शा बदलने जा रही है. आजकल दुनिया में ‘ह्यूमनॉइड रोबोट्स’ (इंसान जैसे रोबोट्स) बनाए जा रहे हैं, लेकिन उनकी प्लास्टिक या मेटल की कड़ी स्किन देखकर तुरंत पता चल जाता है कि वे बेजान हैं. इस शेप-शिफ्टिंग हाइड्रोजेल की मदद से अब ऐसे रोबोट्स बनाए जा सकेंगे, जिनकी चमड़ी इंसानी मांसपेशियों की तरह लचीली होगी. वे माहौल के हिसाब से अपनी स्किन का रंग, तापमान और आकार बदल सकेंगे. वैज्ञानिकों ने एक ऐसा हाइड्रोजेल भी तैयार किया है जो एक महीने में धीरे-धीरे अपना रंग बदलता है, जिससे ये लंबे समय तक काम करने वाले स्मार्ट सेंसर्स में भी इस्तेमाल हो सकेगा.
कब तक आम इंसान तक पहुंचेगा ये चमत्कार?
प्रोफेसर दू शुएमिन का कहना है कि ये रिसर्च लैब में पूरी तरह सफल रही है, लेकिन आम मरीजों के इलाज में इसका कमर्शियल इस्तेमाल होने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा. वैज्ञानिकों के सामने अभी दो बड़ी चुनौतियां हैं.
- सटीक टाइमिंग सेट करना: इंसानी शरीर के हर अंग, जैसे दिल, दिमाग, लीवर या हड्डी, के ठीक होने की स्पीड अलग-अलग होती है. हाइड्रोजेल के आकार बदलने की स्पीड को मरीज की जरूरत के हिसाब से सेट करना एक बड़ी चुनौती है.
- रिमोट कंट्रोल की सुविधा: वैज्ञानिक ऐसा सिस्टम बनाने पर काम कर रहे हैं, जिससे डॉक्टर बाहर से ही बटन दबाकर या लाइट डालकर शरीर के अंदर मौजूद इस जेल के बदलने की रफ्तार को बढ़ा या घटा सकें.

