Donald Trump vs Europe NATO: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो को तोड़ने की तैयारी कर रहे है. दरअसल, ट्रंप ने यूरोप में नाटो की डिफेंसिव फोर्स में अमेरिकी सैन्य मदद को काफी कम करने का फैसला किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले हफ्ते ट्रंप ने एक दूत अलेक्जेंडर वेलेज-ग्रीन को नैटो पॉलिसी डायरेक्टर्स की एक मीटिंग में भेजा, जिससे यूरोपियन साथियों को बताया जा सके कि यूनाइटेड स्टेट्स नाटो को मुहैया करवाए गये रणनीतिक बॉम्बर्स, फाइटर एयरक्राफ्ट, ड्रोन्स, सबमरीन और वॉरशिप्स को वापस बुला रहा है.
हालांकि वापस बुलाए जाने वाले खास एसेट्स और इस पूरी प्रक्रिया की टाइमलाइन के बारे में पता नहीं है. वेलेज़-ग्रीन ने महाद्वीप से अमेरिका के परमाणु हथियारों को हटाने की किसी भी योजना का कोई जानकारी नही दी है. वहीं, अमेरिकी सैन्य सामानों की वापसी ‘दूसरों की ओर से विकल्प लेकर आने की क्षमता पर निर्भर करेगी… कुछ को बिल्कुल नहीं छेड़ा जाएगा, जबकि कुछ पूरी तरह हटा दिए जाएंगे और कुछ को आधा या एक-तिहाई तक कम किया जा सकता है.’
यूरोपीय देशों से सैन्य साजो सामान हटाएगा अमेरिका
बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसला से रूस खुश हो सकता है. दरअसल, रूस हमेशा से यूरोपीय देशों में नाटो का विरोध करता रहा है और अपने अस्तित्व के लिए खतरा बताता रहा है. वहीं, यूक्रेन हमले के पीछे भी राष्ट्रपति वलोडिमीर जेलेंस्की की नाटो में शामिल होने की जिद थी. सैन्य साजो सामान हटाने का फैसला ट्रंप का यूरोपीय देशों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का ताजा हिस्सा है. अमेरिकी राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के ज्यादा करीब दिख रहे हैं.
डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम से पता चलता है कि अमेरिका NATO के तहत सुरक्षा से जुड़ी अपनी प्रतिबद्धताओं से दूर हट रहा है. उन्होंने खुले तौर पर यूरोप के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाया है और उन उदारवादी सरकारों को गिराने की कोशिश की है, जो उनकी मर्जी के आगे नहीं झुकतीं और उनकी जगह रूस-समर्थक, धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों को सत्ता में लाने का प्रयास किया है.
नाटो से ट्रंप की पुरानी नाराजगी
आपको बता दें कि नाटो को लेकर ट्रंप की नाराजगी कोई नई बात नहीं है, उन्होंने चुनावी अभियान के दौरान स्पष्ट रूप से कहा कि वह न सिर्फ इस गठबंधन को छोड़ देंगे बल्कि रूस को इस बात के लिए भी उकसाएंगे कि वह नाटो के उन सदस्य देशों के साथ ‘जो चाहे कर ले’ जो उनकी बात नहीं मानते. हालांकि इस कदम से यूरोपीय देशों में अमेरिका का वर्चस्व और उसका सहयोग और कम होगा और हथियारों की एक ताजा होड़ शुरू होगी. वहीं, यूरोपीय देश आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ेंगे.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों नाटो के तहत अमेरिका की परमाणु सुरक्षा-छतरी से अलग यूरोप की अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने की कोशिशों की अगुवाई कर रहे हैं. यूरोप की एकमात्र पूरी तरह से आत्मनिर्भर परमाणु शक्ति होने के नाते फ्रांस ने यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और पोलैंड के साथ समझौते किए हैं ताकि परमाणु मिसाइलों से लैस अपने राफेल लड़ाकू विमानों की तैनाती में तालमेल बिठाया जा सके.