क्‍या अमेरिका हार जाएगा ईरान से जंग, पूरी दुनिया मान रही…, जानिए क्‍या है चीनी प्रोफेसर जियांग शियुकिंग की भविष्‍यवाणी

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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US-Iran War: ईरान पर अमेरिका-इजरायल के द्वारा किए गए हमले को आज 13वां दिन है. इस युद्ध के दौरान अमेरिका को उम्मीद के खिलाफ ईरान के प्रतिरोध और नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने खाड़ी देशों में उसके 17बेसों पर खासी तबाही पहुंचाई है. युद्ध की इस स्थिति के बीच चीनी प्रोफेसर जियांग शियुकिंग भी खासे चर्चित हो रहे हैं. उन्होंने ये भविष्यवाणी की है कि अमेरिका ये युद्ध हार जाएगा.

दरअसल दो साल पहले विश्लेषण के आधार पर की गईं उनकी दो भविष्यवाणियां जिस तरह से सच निकलीं, उससे ये तीसरी भविष्यवाणी काफी चर्चित हो रही है. इसका विश्लेषण होने लगा है कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा है.

जियांग ने दो साल पहले की थी भविष्‍यवाणी

बता दें कि चीनी प्रोफेसर जियांग शियुकिंग येल यूनिवर्सिटी के स्कॉलर हैं. उनसे जुड़ी ये रिपोर्ट फिलिस्तान क्रोनिकल ने प्रकाशित की है. जो बड़े पैमाने पर पढ़ी जा रही है. जियांग ने ये भविष्यवाणी दो साल पहले अपने प्रेडिक्टिव हिस्ट्री प्लेटफॉर्म के माध्यम से की थी. यहां वह साम्राज्यों के व्यवहार का विश्लेषण करते हैं.

जियांग की तीन भविष्यवाणियों में से दो हो चुकी है सच

2024 में जियांग ने तीन भविष्यवाणियां कीं थीं- जिसमें से पहली भविष्‍यवाणी– डोनाल्ड ट्रंप फिर अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर लौटेंगे, जो कि सच साबित हो चुकी है. दूसरी भविष्यवाणी– ईरान के साथ युद्ध का प्रकोप होगा, जो मौजूदा समय में देखने को मिल ही रहा है. वहीं, तीसरी भविष्यवाणी– ये थी कि इस युद्ध में अमेरिका की हार की आशंका है.

ऐसे में सभी के मन में ये सवाल है कि क्‍या सच में इस जंग में ईरान अमेरिका को मात देगा, क्‍याकि जियांग की पहली दो भविष्यवाणियां अब तक सच हो चुकी हैं. बता दें कि जियांग का तर्क सैन्य शस्त्रागार के आकार पर नहीं, बल्कि इसमें शामिल पक्षों की सहनशक्ति और लचीलेपन पर केंद्रित है. इसके अलावा, जियांग अपने यूट्यूब चैनल प्रेडिक्टिव हिस्ट्री के लिए भी जाने जाते हैं. उन्हें चीन के नोस्त्रादेमस” का उपनाम मिला हुआ है.

वर्तमान टकराव कोई पारंपरिक युद्ध नहीं

जियांग का कहना है कि वर्तमान टकराव कोई पारंपरिक युद्ध नहीं है जो जल्दी समाप्त हो जाएगा, बल्कि यह एक ऐसा संघर्ष है जो धीरे-धीरे बढ़ेगा और काफी नुकसान करेगा. बकौल उनके ईरान की रणनीति लंबा टिकने और धीरे धीरे दुश्मन का नुकसान करने में है.

वियतनाम के साथ जंग में हार गया था अमेरिका

वह इसके लिए वियतनाम युद्ध को ऐतिहासिक उदाहरण के तौर पर पेश करते हैं. 60 के शुरू में अमेरिका ने ये युद्ध शुरू किया. ये लड़ाई करीब 15 सालों तक चलती रही. अमेरिका वह युद्ध सैन्य क्षमता की कमी के कारण नहीं हारा, बल्कि इसलिए हारा क्योंकि ये लड़ाई लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में बदल चुकी थी, जिसमें वियतनामी नेतृत्व ने अमेरिकी राजनीतिक और आर्थिक संसाधनों को पूरी तरह से खत्म ही कर दिया था. तब अमेरिका अनावश्यक तौर पर केवल इसलिए वियतनाम के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था कि कहीं वो कम्युनिस्ट देश ना बन जाए. आखिरकार अमेरिका उसको ऐसा करने से रोक नहीं पाया.

ईरान के पास वियतनाम से ज्यादा क्षमताएं

वैसे आपको बता दें कि आज ईरान के पास ऐसी क्षमताएं हैं जो वियतनाम के पास कभी नहीं थीं. इनमें अत्याधुनिक बैलिस्टिक मिसाइल भंडार, उन्नत ड्रोन कार्यक्रम और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताएं शामिल हैं. इसके अलावा, ईरान ने क्षेत्रीय गठबंधन और प्रॉक्सीज बना दिये हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से उसका एक बड़ा रणनीतिक प्रभाव है, जिससे होकर वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग एक तिहाई हिस्सा गुजरता है. उसने जब युद्ध के दौरान इस जल मार्ग को बंद कर दिया तो आधी से ज्यादा दुनिया त्राहि त्राहि करने लगी है.

कुल मिलाकर, ये क्षमताएं ईरान की न केवल आत्मरक्षा करने की क्षमता को बढ़ाती हैं बल्कि अपने विरोधियों पर व्यापक स्तर पर लगातार युद्ध थोपने की क्षमता को भी बढ़ाती हैं – ईरान शायद वियतनाम में अनुभव किए गए गुरिल्ला युद्ध की तुलना में कहीं अधिक जबरदस्त और जटिल लड़ाई जारी रख सकता है.यहां मुख्य मुद्दा समय, वित्तीय लागत और आंतरिक दबाव हैं, जो तय करेंगे किसकी सैन्य श्रेष्ठता को लंबे समय तक कायम रहेगी या नहीं रहेगी.

क्यों दुनिया के लिए खतरनाक है लंबा युद्ध?

खाड़ी क्षेत्र लंबा युद्ध दुनिया के लिए खतरनाक होगा, क्योंकि इसका महत्व समुद्री परिवहन, माल लाने ले जाने और ऊर्जा उत्पादन से कहीं अधिक है; ये वैश्विक आर्थिक प्रणालियों की नब्ज पर भी सीधे हाथ रखने में सक्षम है और इन दिनों सारी दुनिया ये महसूस भी कर रही है.

एक लंबा युद्ध वाशिंगटन पर दोहरा दबाव डालेगा. ऊर्जा प्रवाह और व्यापार मार्गों में व्यवधान वैश्विक बाजारों को कमजोर कर सकता है. साथ ही साथ लंबा युद्ध वित्तीय और सैन्य बोझ को भी बढ़ा सकता है. सबसे बड़ी दिक्कत ये भी है कि युद्ध लंबा चला तो खाड़ी के तमाम देशों के सामने बर्बादी का खतरा पैदा हो जाएगा, ये देश ज्यादा अमेरिका के सहयोगी हैं, जिनकी रक्षा का जिम्मा का दावा अमेरिका करता रहा है. आपूर्ति श्रृंखलाओं और समुद्री मार्गों में व्यवधान पैदा होने से इन खाड़ी देशों पर ज्यादा और दुनिया के दूसरे देशों की भी आर्थिक स्थिरता, सामाजिक एकता और सुरक्षा व्यवस्था चरमरा जाएगी.

क्‍या है खाड़ी देशों का मानना?

खाड़ी देशों के भीतर राजनीतिक चर्चा में इस तनाव की झलक पहले ही दिखने लगी है. कतर के पूर्व प्रधानमंत्री हमाद बिन जसीम, सऊदी अरब के राजकुमार तुर्की अल-फैसल और अमीराती व्यवसायी खलफ अल हबतूर सहित प्रमुख क्षेत्रीय हस्तियों ने सुझाव दिया है कि यह युद्ध मूल रूप से खाड़ी देशों का संघर्ष नहीं है, बल्कि वाशिंगटन और तेल अवीव के हितों से प्रेरित टकराव है. ऐसे बयान खाड़ी देशों की राजनीतिक सोच में बढ़ते रुझान को दिखाते हैं. यानि ये बताते हैं कि वो इजरायल की महत्वाकांक्षाओं के कारण मुश्किल में पड़ रहे हैं.

ट्रंप के लिए घातक साबित हो सकता है युद्ध

लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष उस राजनीतिक आधार के लिए घातक साबित हो सकता है जिसके चलते ट्रंप दोबारा चुनाव जीतकर वापस सत्ता में लौटे थे. उनके खिलाफ घरेलू विरोध बढ़ सकता है, जिससे प्रशासन और कांग्रेस पर दबाव बढ़ जाएगा.

जनमत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि अमेरिकी नागरिक विदेशों में नए सैन्य हस्तक्षेपों का समर्थन करने में अनिच्छुक होते जा रहे हैं. कांग्रेस के मतदान ने भी गहरे मतभेदों को उजागर किया, जिसमें 53 के मुकाबले 47 मतों के मामूली अंतर से विधेयक पारित हुआ.

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