हूतियों के सऊदी की सबसे बड़ी पाइपलाइन फोड़ते ही टूट गया मक्का पैक्ट? पाकिस्तान, तुर्की ने पीछे खींचे हाथ

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New Delhi: मुस्लिम देशों के नाम पर पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की के बीच हुआ समझौता, अब NATO की तरह ही बिखरता हुआ नजर आ रहा है. पाकिस्तान की किस्मत ऐसी खराब है कि उसने जब भी कोई समझौता किया, तो उसका टेस्ट तुरंत ही हो गया और हर बार वो फेल ही हुआ. सऊदी अरब के साथ डिफेंस पैक्ट होते ही ईरान युद्ध छिड़ गया और मक्का पैक्ट पर दस्तखत होते ही सऊदी अरब का हूतियों के साथ संघर्ष. दोनों ही अग्निपरीक्षाओं में पाकिस्तान फेल नजर आ रहा है.

सिर्फ धमकियां दे रहा तुर्की

सऊदी की सबसे बड़ी पाइपलाइन को हूतियों ने फोड़ डाला और तुर्की सिर्फ धमकियां दे रहा है. पाकिस्तान इस संघर्ष में सऊदी का पक्ष ईरान के सामने रखने लगा, तो ईरान ने उसे झिड़क दिया. कूटनीतिक मजबूरियां अपनी तरफ हैं लेकिन जब आप किसी देश के साथ ऐसे सुरक्षा समझौते में आते हैं, जहां एक-दूसरे की रक्षा का वादा किया जाता है, तो बातों से काम नहीं चलता. मुस्लिम देशों के नाम पर पाकिस्तान ने ही सऊदी और तुर्की के साथ ये समझौता किया था क्योंकि उसे डर भारत के हमले का था.

समझौतों की तलाश कर रहा था पाकिस्तान 

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से पाकिस्तान ऐसे समझौतों की तलाश कर रहा था, जहां उसे किसी की छत्रछाया मिल सके. पहले उसने सऊदी अरब को पकड़ा और फिर धीरे-धीरे तुर्की को भी इसमें शामिल कर लिया. समझौते को इस्लामिक NATO कहा गया, लेकिन अब NATO की तरह ही ये बिखरता हुआ नजर आ रहा है. ईरान-अमेरिका का युद्ध इस होर्मुज में दोबारा बढ़ा, तो हूतियों ने लाल सागर में मोर्चा खोल दिया.

तेल बेचने का धंधा ठप

अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक पाबंदी बढ़ा दी ताकि उसका तेल बेचने का धंधा ठप पड़ जाए, तो ईरान के ही प्रॉक्सी माने जाने वाले हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में सऊदी अरब का धंधा बंद कराने की कसम खा ली. यमन की सऊदी समर्थित सरकार ने हूतियों के ठिकाने तबाह करने शुरू किए, लेकिन ये उम्मीद से ज्यादा तगड़े निकले और उन्होंने सऊदी के सैन्य ठिकानों से लेकर तेल सप्लाई की वो पाइपलाइन ठोक दी, जिससे 4 फीसदी ग्लोबल ऑयल सप्लाई चलती थी.

स्टॉक सिर्फ 4-5 दिन का बचा

सऊदी के इस अहम पोर्ट पर तेल का स्टॉक सिर्फ 4-5 दिन का बचा है और कुछ दिन और ऐसा ही चला तो तेल की किल्लत बढ़ेगी और दाम आसमान छुएंगे. इन सबके बीच सऊदी अरब की मदद के लिए तुर्की और पाकिस्तान को मक्का पैक्ट के मुताबिक भागकर आना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इतना सब कुछ हो गया लेकिन तुर्की और पाकिस्तान सिर्फ कह रहे हैं कि हम साथ हैं लेकिन जमीन पर कोई नहीं आया.

मध्यस्थता करने की कोशिश

पाकिस्तान ने ईरान से सऊदी की मध्यस्थता करने की कोशिश की तो ईरान ने साफ कह दिया कि हूतियों पर उनका कोई कंट्रोल नहीं है. तुर्की कह रहा है कि मक्का पैक्ट के तहत हम साथ हैं पर रक्षात्मक नजरिये से. इसका क्या मतलब समझा जाए? सऊदी का नुकसान पर नुकसान होता रहेगा और दोनों रक्षक सिर्फ खोखली निंदा करते रहेंगे?

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