Xi Jinping: यूरोपीय नेताओं और सांसदों ने चीन के जातीय एकता और प्रगति कानून की आलोचना की है. इसे तिब्बतियों और अन्य जातीय अल्पसंख्यकों की सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक पहचान को कमजोर करने वाला कदम बताया है. केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के मुताबिक, 1 जुलाई को कानून के लागू होने के बाद से पूरे यूरोप में इसका विरोध बढ़ता ही जा रहा है, और कई दलों के राजनेता इसे रद्द करने का अपील कर रहे हैं.
मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया
CTA के मुताबिक, 30 अप्रैल, 2026 को यूरोपीय संसद द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद यह आलोचना सामने आई है, जिसमें सांसदों ने भारी बहुमत से इस कानून की निंदा की थी. उनका तर्क था कि यह कानून तिब्बतियों, उइगरों, दक्षिणी मंगोलों और अन्य समुदायों के जबरन आत्मसातीकरण को बढ़ावा देता है. ऐसे में प्रस्ताव में उन्होने इस कानून को वापस लेने की मांग की.
संसद में बहसों के दौरान, यूरोपीय संसद के कई सदस्यों ने बीजिंग पर आरोप लगाया कि वह इस कानून का इस्तेमाल जातीय पहचान को कमजोर करने के लिए कर रहा है. उनका कहना था कि दलाई लामा के उत्तराधिकार जैसे मामले पूरी तरह से धार्मिक दायरे में ही रहने चाहिए और उन्होंने इस प्रक्रिया में चीन की किसी भी भूमिका को खारिज कर दिया. जबकि अन्य सांसदों ने तर्क दिया कि यह कानून अल्पसंख्यक भाषाओं को सीमित करता है, सांस्कृतिक परंपराओं को कमजोर करता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है.
11वें पंचेन लामा पर पारदर्शिता की मांग की
यूरोपीय आयोग की तरफ से, कमिश्नर हाद्जा लाहबिब ने तिब्बत में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर यूरोपीय संघ की चिंताएं फिर से जाहिर कीं. उन्होंने धार्मिक आजादी और तिब्बती संस्कृति व पहचान को बनाए रखने पर लगी पाबंदियों का जिक्र करते हुए 11वें पंचेन लामा के ठिकाने के बारे में पारदर्शिता की मांग की.
यूनाइटेड नेशंस ह्यूमन राइट्स काउंसिल के 62वें सत्र के दौरान यूरोपियन यूनियन ने इस कानून को लेकर चिंता जताई थी और इसके संभावित ‘एक्स्ट्रा-टेरिटोरियल’ (देश की सीमाओं के बाहर पड़ने वाले) असर के बारे में चेतावनी दी थी. पूरे यूरोप में राष्ट्रीय विधानसभाओं की ओर से भी इसका विरोध हुआ है.
CTA की रिपोर्ट के अनुसार, डच, फ्रेंच और बेल्जियन सांसदों ने तिब्बत के मुद्दे पर यूरोप के बीच बेहतर तालमेल की मांग की है. उन्होंने तिब्बत के लिए ईयू का एक स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव नियुक्त करने और तिब्बती सांस्कृतिक व धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए बीजिंग के साथ ज़्यादा कूटनीतिक बातचीत करने का भी आग्रह किया है.

